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"धोरों की मखमली रेत में अग्नि नृत्य की ज्वाला: बाड़मेर महोत्सव का भव्य समापन"

Mohit Parihar 11 months ago
धोरों के मखमली रंगों में लिपटा महोत्सव: अग्नि नृत्य की ज्वाला से विदाई राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके बाड़मेर महाबार में अनोखी सांस्कृतिक धरोहर को समर्पित एक भव्य उत्सव का समापन हाल ही में धोरों की गोद में हुआ, जहां मखमली रेत के टीले अग्नि नृत्य की लपटों से जगमगा उठे। यह आयोजन न केवल स्थानीय लोक कलाओं का उत्सव था, बल्कि परंपरा और आधुनिकता का अनुपम संगम भी साबित हुआ, जिसमें पद्मश्री सम्मानित कलाकारों से लेकर राज्य के मंत्री तक ने अपनी कला से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।उत्सव के अंतिम दिन का मुख्य आकर्षण रहा अग्नि नृत्य, जो धोरों के नरम, मखमली इलाकों में सूर्यास्त के समय प्रज्ज्वलित हुआ। कलाकारों ने जलती हुई मशालों और दीयों के साथ एक खतरनाक लेकिन मोहक प्रदर्शन किया, जहां हर लहराती लपट राजस्थानी लोक जीवन की ऊर्जा को प्रतिबिंबित कर रही थी। दर्शकवृंद, जो दूर-दूर से आए थे, इस नृत्य की ताल पर थिरकते नजर आए। यह प्रदर्शन न केवल दृश्यों का त्योहार था, बल्कि ध्वनि और प्रकाश का ऐसा मेल, जो रात के अंधेरे को भी रोशन कर देता। आयोजकों के अनुसार, यह नृत्य पारंपरिक 'फायर डांस' की राजस्थानी शैली पर आधारित था, जिसमें कलाकारों ने घुंघरूओं की झंकार के साथ आग की अंगड़ाइयों को ताल दे रखा था।इस समापन समारोह की एक और यादगार कड़ी बनी पद्मश्री प्राप्त गायिका का गीत 'धरती धोरों री'। उनकी मधुर स्वर लहरियां धोरों की वीरता और सौंदर्य को जीवंत कर उठीं। गीत के बोल, जो राजस्थानी बोली में बुने गए थे, ने श्रोताओं को अपनी जड़ों से जोड़ दिया—एक ऐसी धुन जो रेत के कणों से लेकर हृदय तक उतर जाती है। कलाकार ने बताया कि यह गीत उनके लिए मात्र प्रदर्शन नहीं, बल्कि धोरों की आत्मा को समर्पित एक प्रार्थना है, जो पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत को भी रेखांकित करता है। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया, और कईयों की आंखों में भावुकता छलक पड़ी।समारोह में राज्य के मंत्री के.के. विश्नोई की उपस्थिति ने इसे और भी गरिमामय बना दिया। उन्होंने एक हृदयस्पर्शी भजन गाकर सभी को आशीर्वाद प्रदान किया। उनका भजन, जो भक्ति रस से ओतप्रोत था, ने उत्सव को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि ऐसे आयोजन राजस्थान की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करते हैं और युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम बनते हैं। उन्होंने धोरों को न केवल भौगोलिक, बल्कि भावनात्मक धरोहर बताते हुए, इसके संरक्षण पर जोर दिया। उनके भजन की धुन ने माहौल को शांत और विचारपूर्ण बना दिया, जो अग्नि नृत्य की उत्तेजना के बाद एक संतुलित विदाई का रूप ले चुकी थी।यह महोत्सव, जो कई दिनों तक चला, ने लोक नृत्यों, हस्तशिल्प प्रदर्शनियों और पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से धोरों के जीवन को जीवंत किया था। समापन के साथ ही आयोजकों ने अगले वर्ष के लिए और भी विस्तृत योजनाओं का संकेत दिया, जिसमें डिजिटल माध्यमों से वैश्विक दर्शकों को जोड़ने की बात कही गई। कुल मिलाकर, यह समापन न केवल एक उत्सव का अंत था, बल्कि राजस्थानी संस्कृति की अमर ज्योति का प्रज्वलन भी, जो मखमली धोरों पर हमेशा कायम रहेगी।
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