भारत में सरकारी नौकरी को आज भी सुरक्षित और सम्मानजनक करियर माना जाता है। लाखों युवा हर साल सरकारी भर्तियों की तैयारी करते हैं और चयन सूची में जगह बनाने के लिए वर्षों तक मेहनत करते हैं। लेकिन केरल से सामने आया एक मामला सरकारी भर्ती प्रणाली की धीमी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यहां एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र तब मिला, जब वह नौकरी करने की निर्धारित आयु सीमा ही पार कर चुका था।

2005 में दी थी भर्ती परीक्षा

केरल के मलप्पुरम जिले के रहने वाले अब्दुल मजीद ने वर्ष 2005 में पार्ट-टाइम जूनियर अरबी शिक्षक के पद के लिए आयोजित सरकारी भर्ती परीक्षा में हिस्सा लिया था। परीक्षा के बाद उनका नाम चयन सूची में शामिल हो गया था। चयन होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि जल्द ही नियुक्ति पत्र मिलेगा और उनका सरकारी नौकरी का सपना पूरा हो जाएगा।

हालांकि, समय बीतता गया और नियुक्ति को लेकर कोई सूचना नहीं मिली। कई वर्षों तक इंतजार करने के बाद उन्होंने उम्मीद छोड़ दी और अपने जीवन की दूसरी राह चुन ली।

2008 में समाप्त हो गई थी चयन सूची

जानकारी के अनुसार, जिस रैंक लिस्ट में अब्दुल मजीद का नाम शामिल था, उसकी वैधता वर्ष 2008 में समाप्त हो गई थी। इसके बावजूद संबंधित पद लंबे समय तक रिक्त पड़ा रहा। विभिन्न प्रशासनिक और तकनीकी कारणों से उस पद पर नियुक्ति नहीं हो सकी।

कई बार भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन मामला किसी न किसी वजह से अटकता रहा। नतीजा यह हुआ कि चयनित उम्मीदवारों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।

18 साल बाद आया नियुक्ति पत्र

हाल ही में पुराने रिकॉर्ड की समीक्षा के दौरान संबंधित रिक्त पद के लिए अब्दुल मजीद का नाम फिर सामने आया। इसके बाद केरल लोक सेवा आयोग (PSC) ने उन्हें एडवाइस मेमो यानी नियुक्ति से संबंधित पत्र जारी कर दिया।

लेकिन तब तक करीब 18 साल गुजर चुके थे। जिस नौकरी के लिए उन्होंने युवावस्था में आवेदन किया था, उसका पत्र उन्हें 61 वर्ष की उम्र में मिला।

सपना पूरा होने से पहले ही खत्म हो गया अवसर

अब्दुल मजीद का कहना है कि सरकारी नौकरी हासिल करना उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना था। चयन सूची में नाम आने के बाद उन्होंने लंबे समय तक नियुक्ति का इंतजार किया, लेकिन जब कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने अन्य कामों में खुद को व्यस्त कर लिया।

अब जबकि नियुक्ति पत्र मिला है, वे सरकारी सेवा की अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके हैं। ऐसे में यह नियुक्ति उनके लिए केवल एक दस्तावेज बनकर रह गई है, क्योंकि वे अब नौकरी ज्वाइन नहीं कर सकते।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

जैसे ही यह मामला सामने आया, सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं तेजी से आने लगीं। कई यूजर्स ने इसे सरकारी व्यवस्था की सुस्ती का उदाहरण बताया। कुछ लोगों ने टिप्पणी की कि मजीद ने नौकरी के लिए आवेदन अपनी जवानी में किया था, लेकिन नियुक्ति पत्र उन्हें रिटायरमेंट की उम्र में मिला।

कई लोगों ने भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, रिक्त पदों को लंबे समय तक खाली रखने और प्रशासनिक लापरवाही जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए। वहीं, कुछ लोगों ने इसे लाखों अभ्यर्थियों की परेशानी से जोड़ते हुए भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने की मांग की।

भर्ती प्रणाली पर उठे सवाल

यह मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में होने वाली देरी की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चयन सूची में शामिल उम्मीदवारों को समय पर नियुक्ति दी जाए तो न केवल रिक्त पद भरेंगे बल्कि युवाओं का भरोसा भी मजबूत होगा।

अब्दुल मजीद की कहानी एक ओर धैर्य और संघर्ष की मिसाल है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी छोड़ जाती है कि क्या किसी उम्मीदवार को अपने सपनों की नौकरी के लिए 18 साल इंतजार करना चाहिए?