गुरुग्राम में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रक्रिया की विश्वसनीयता और सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दो बेटियों के माता-पिता एक दंपती ने उम्र बढ़ने के बाद तीसरी बार माता-पिता बनने का फैसला किया। IVF प्रक्रिया के जरिए महिला गर्भवती हुई और नौ महीने बाद जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया। लेकिन खुशियां उस समय सदमे में बदल गईं जब DNA टेस्ट में पता चला कि बच्चियों का DNA न मां से मेल खाता है और न पिता से।

दंपती का आरोप है कि IVF प्रक्रिया के दौरान उनके भ्रूण किसी अन्य दंपती के भ्रूण से बदल दिए गए।

मां बनने की खुशी से शुरू हुई कहानी

गुरुग्राम निवासी मीनू और राहुल राठौर पहले से दो बेटियों के माता-पिता हैं। परिवार बढ़ाने की इच्छा के चलते उन्होंने IVF का सहारा लिया। मीनू बताती हैं कि IVF प्रक्रिया बेहद कठिन और दर्दनाक रही। महीनों तक दवाइयां, हार्मोनल इंजेक्शन और लगातार मेडिकल प्रक्रियाओं के बावजूद वह सिर्फ इस उम्मीद में सब सहती रहीं कि जल्द ही उनके घर एक नया सदस्य आएगा।

आखिरकार नौ महीने बाद जुड़वां बच्चियों का जन्म हुआ और परिवार में खुशियों का माहौल बन गया।

रिश्तेदारों के सवालों से शुरू हुआ शक

बच्चियों के जन्म के बाद कुछ रिश्तेदारों ने उनके चेहरे-मोहरे को लेकर सवाल उठाने शुरू किए। परिवार के कुछ सदस्यों को लगा कि बच्चियों की शक्ल-सूरत माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों से काफी अलग है।

शुरुआत में इन बातों को नजरअंदाज किया गया, लेकिन लगातार चर्चा होने पर परिवार ने DNA टेस्ट कराने का फैसला किया।

DNA रिपोर्ट ने बदल दी जिंदगी

DNA टेस्ट की रिपोर्ट आने के बाद परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। रिपोर्ट में सामने आया कि बच्चियों का जैविक संबंध न पिता से है और न मां से।

इस खुलासे के बाद पूरे परिवार को गहरा मानसिक आघात पहुंचा। दंपती का आरोप है कि IVF क्लिनिक में भ्रूण बदल दिए गए, जिसके कारण किसी अन्य दंपती के बच्चे उनकी कोख से जन्मे।

अपने बच्चों की तलाश में भटक रहा परिवार

दंपती का कहना है कि वे उन जुड़वां बच्चियों से उतना ही प्यार करते हैं जितना अपने बच्चों से करते। आखिर मीनू ने उन्हें नौ महीने तक गर्भ में रखा और जन्म दिया है।

लेकिन इसके साथ ही उन्हें अपने जैविक बच्चों की चिंता भी सता रही है। उनका सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनके असली बच्चे आखिर कहां हैं और किसके पास हैं।

राहुल राठौर का कहना है कि पिछले कई महीनों से वे पुलिस, अदालत, विभिन्न सरकारी विभागों और जांच एजेंसियों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला है।

कानूनी लड़ाई जारी

दंपती का दावा है कि उन्होंने मामले की शिकायत संबंधित एजेंसियों और अदालत में की है। अदालत द्वारा जांच के निर्देश दिए जाने के बावजूद उन्हें अब तक अपने बच्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है।

मामले की जांच जारी है और पुलिस ने भी इसकी पुष्टि की है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने तक विस्तृत जानकारी साझा नहीं की जा सकती।

बच्चियों को अपना ही मानता है परिवार

इस पूरे विवाद और दर्द के बावजूद परिवार ने जुड़वां बच्चियों को पूरी तरह अपनाया हुआ है। दंपती का कहना है कि बच्चियां किसी गलती की जिम्मेदार नहीं हैं और उन्हें हर वह प्यार और सम्मान मिलेगा जिसकी वे हकदार हैं।

परिवार का कहना है कि उनकी लड़ाई बच्चियों से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जिसने उन्हें इस स्थिति में पहुंचाया। उनकी सबसे बड़ी मांग सिर्फ इतनी है कि उनके जैविक बच्चों का पता लगाया जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो।

फिलहाल यह मामला जांच के अधीन है और अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों तथा अदालत की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।