देश में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ (One Nation One Election) को लेकर केंद्र सरकार की कवायद तेज होती दिखाई दे रही है। बार-बार होने वाले चुनावों से प्रशासनिक और वित्तीय बोझ कम करने के उद्देश्य से सरकार अब एक व्यावहारिक मॉडल पर काम कर रही है। इसके तहत पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के बजाय दो चरणों में चुनावी चक्र को एक करने की योजना पर विचार किया जा रहा है।

संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से जुड़े सूत्रों के अनुसार, ‘टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल’ सबसे व्यवहारिक विकल्प माना जा रहा है। इस मॉडल के तहत 2029 और 2034 के बीच चरणबद्ध तरीके से लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साझा चुनावी कैलेंडर में लाया जाएगा।

2029 से शुरू हो सकती है नई व्यवस्था

प्रस्तावित योजना के अनुसार, 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ लगभग 20 राज्यों के विधानसभा चुनाव भी कराए जा सकते हैं। इसके बाद अगले चरण में 2034 तक बाकी राज्यों को भी इसी चुनावी चक्र में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह माना जा रहा है कि राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में बहुत अधिक कटौती या विस्तार की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इससे संवैधानिक और राजनीतिक विवादों को भी कम किया जा सकेगा।

किन राज्यों पर पड़ेगा असर?

प्रस्तावित चुनावी पुनर्गठन के तहत कुछ राज्यों के कार्यकाल में मामूली बदलाव संभव है।

जिन राज्यों का कार्यकाल बढ़ सकता है

  • राजस्थान
  • मध्य प्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • कर्नाटक
  • तेलंगाना
  • त्रिपुरा
  • मेघालय
  • नागालैंड
  • मिजोरम

इन राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल लगभग 5 महीने से 1 साल तक बढ़ाया जा सकता है।

जिन राज्यों में कोई बदलाव नहीं होगा

  • महाराष्ट्र
  • हरियाणा
  • झारखंड
  • आंध्र प्रदेश
  • ओडिशा
  • अरुणाचल प्रदेश
  • सिक्किम

इन राज्यों के चुनाव पहले से ही 2029 के आसपास निर्धारित हैं।

जिन राज्यों का कार्यकाल कम हो सकता है

  • बिहार
  • पश्चिम बंगाल
  • तमिलनाडु
  • केरल
  • असम
  • दिल्ली
  • पुड्डुचेरी

इन राज्यों में विधानसभा का कार्यकाल 1 से 2 साल तक कम किया जा सकता है, ताकि चुनावी चक्र को एक किया जा सके।

संविधान में है रास्ता, लेकिन जरूरी है सहमति

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान में ऐसी व्यवस्था की गुंजाइश मौजूद है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के विधि महाविद्यालय के डीन और लॉ कमीशन के पूर्व सदस्य आनंद पालीवाल के अनुसार, संसद विशेष कानून बनाकर कुछ राज्यों के कार्यकाल को बढ़ा या घटा सकती है।

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इतने बड़े बदलाव के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता पड़ सकती है।

समर्थकों के तर्क

‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ के समर्थकों का कहना है कि—

  • बार-बार चुनाव होने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
  • आचार संहिता लागू होने पर सरकारी योजनाओं की गति धीमी पड़ जाती है।
  • प्रशासनिक मशीनरी का बड़ा हिस्सा चुनावी कार्यों में व्यस्त रहता है।
  • चुनावी खर्च में हजारों करोड़ रुपए की बचत हो सकती है।
  • सुरक्षा बलों और सरकारी कर्मचारियों पर दबाव कम होगा।

विरोधियों की चिंताएं

विपक्षी दलों और कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव को लेकर सवाल उठाए हैं।

  • विधानसभा का कार्यकाल बढ़ाना या घटाना जनादेश के साथ छेड़छाड़ माना जा सकता है।
  • राष्ट्रीय मुद्दों की आंधी में स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे दब सकते हैं।
  • संघीय ढांचे पर असर पड़ने की आशंका है।
  • छोटे और क्षेत्रीय दलों को नुकसान हो सकता है।

1967 तक साथ होते थे चुनाव

भारत में 1952, 1957, 1962 और 1967 के चुनावों में लोकसभा और अधिकांश राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे।

लेकिन 1967 के बाद कई राज्यों में सरकारें समय से पहले गिरने लगीं। 1968-69 में कई विधानसभाएं भंग हुईं और 1970 में लोकसभा भी समय से पहले भंग हो गई। इसके बाद देश का साझा चुनावी चक्र टूट गया और अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।

JPC राज्यों से ले रही है सुझाव

संयुक्त संसदीय समिति (JPC) विभिन्न राज्यों का दौरा कर सुझाव जुटा रही है।

महाराष्ट्र दौरा

मई 2025 में समिति ने महाराष्ट्र का दौरा कर मुख्यमंत्री, प्रशासनिक अधिकारियों, सार्वजनिक उपक्रमों और विभिन्न संगठनों से चर्चा की। उद्देश्य यह जानना था कि एक साथ चुनाव कराने से शासन और प्रशासन पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

उत्तराखंड दौरा

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने समिति को बताया कि पिछले तीन वर्षों में बार-बार चुनाव और आचार संहिता के कारण लगभग 175 दिन सरकारी कार्य प्रभावित हुए।

उनका दावा था कि यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराए जाएं तो 30 से 35 प्रतिशत तक खर्च कम किया जा सकता है।

कोविंद समिति ने दी थी सिफारिश

‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ पर विचार के लिए केंद्र सरकार ने 2 सितंबर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति बनाई थी।

करीब 191 दिनों के अध्ययन, विशेषज्ञों से परामर्श और विभिन्न देशों की चुनावी व्यवस्थाओं के विश्लेषण के बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी।

किन देशों के मॉडल का अध्ययन किया गया?

कोविंद समिति ने कई देशों की चुनाव प्रणाली का अध्ययन किया, जिनमें—

  • दक्षिण अफ्रीका
  • स्वीडन
  • जर्मनी
  • जापान
  • इंडोनेशिया
  • फिलीपींस

शामिल हैं।

इंडोनेशिया में राष्ट्रपति, संसद और स्थानीय निकायों के कई चुनाव एक ही दिन कराए जाते हैं, जबकि स्वीडन में संसद और स्थानीय परिषदों के चुनाव एक साथ आयोजित किए जाते हैं।

2026 में आएगी JPC की रिपोर्ट

संयुक्त संसदीय समिति को अपनी अंतिम रिपोर्ट 2026 के मानसून सत्र तक संसद को सौंपनी है। रिपोर्ट में राज्यों, राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और प्रशासनिक संस्थाओं से मिले सुझावों को शामिल किया जाएगा।

रिपोर्ट आने के बाद संसद में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा और संभावित विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। यदि राजनीतिक सहमति बनती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भारत के चुनावी इतिहास में एक बड़ा बदलाव लेकर आ सकता है।