राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भीलवाड़ा और बांसवाड़ा के सरकारी अस्पतालों में पिछले छह दिनों के भीतर सात प्रसूताओं की मौत होने से हड़कंप मच गया है। इनमें अधिकांश महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही और संक्रमणयुक्त उपकरणों के इस्तेमाल के आरोप लगाए हैं।

सबसे गंभीर मामला भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल स्थित मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (एमसीएच) का है, जहां छह दिनों में पांच प्रसूताओं की मौत हो चुकी है। इसी बीच ऑपरेशन थिएटर (ओटी) की संक्रमण जांच (कल्चर टेस्ट) रिपोर्ट पॉजिटिव आने से अस्पताल की व्यवस्थाओं पर और भी गंभीर सवाल उठ गए हैं।

सिजेरियन के बाद बिगड़ी तबीयत, ICU में हुई मौतें

भीलवाड़ा एमसीएच में जिन पांच महिलाओं की मौत हुई, उन सभी की सिजेरियन डिलीवरी की गई थी। ऑपरेशन के बाद उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें मेडिकल आईसीयू में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

शुक्रवार को जिले के पोटला गांव निवासी 32 वर्षीय संगीता जीनगर की भी मौत हो गई। उनकी मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल में हंगामा करते हुए डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया।

ओटी की रिपोर्ट पॉजिटिव, संक्रमण की आशंका बढ़ी

मामले में सबसे चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि एमसीएच के ऑपरेशन थिएटर की कल्चर टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इससे यह आशंका गहरा गई है कि ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण मौजूद था, जिसने प्रसूताओं की जान जोखिम में डाली।

सूत्रों के अनुसार अस्पताल में प्रतिदिन 30 से 40 सिजेरियन ऑपरेशन किए जाते हैं, जबकि नियमित उपयोग के लिए केवल पांच और इमरजेंसी के तीन सर्जिकल सेट उपलब्ध हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी सर्जिकल सेट को दोबारा उपयोग करने से पहले कम से कम तीन घंटे की स्टरलाइजेशन प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक होता है। लेकिन ऑपरेशन का दबाव अधिक होने के कारण उपकरणों के पर्याप्त रूप से स्टरलाइज न होने की आशंका जताई जा रही है।

मार्च से अब तक 9 प्रसूताओं की मौत

महात्मा गांधी अस्पताल में मार्च 2026 से अब तक कुल नौ प्रसूताओं की मौत हो चुकी है। इनमें से पांच मौतें केवल जुलाई के पहले दस दिनों में हुई हैं। लगभग हर मामले में परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर इलाज में लापरवाही और समय पर उचित देखभाल नहीं मिलने के आरोप लगाए हैं।

अस्पताल प्रशासन ने लापरवाही से किया इनकार

महात्मा गांधी अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अरुण गौड़ ने किसी भी प्रकार की लापरवाही से इनकार किया है। उनका कहना है कि अधिकांश मरीज गंभीर हालत में अन्य अस्पतालों से रेफर होकर यहां पहुंचते हैं और चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण उनकी मौत हो जाती है।

एमसीएच प्रबंधन के अनुसार मौतों के पीछे पल्मोनरी एम्बोलिज्म, एस्पिरेशन, गंभीर एनीमिया, सीजर, पीआईएच, एक्लेम्पसिया और अन्य प्रसूति संबंधी जटिलताएं जिम्मेदार रही हैं।

बांसवाड़ा में भी दो घंटे में दो प्रसूताओं की मौत

भीलवाड़ा के साथ ही बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में भी शुक्रवार सुबह दो घंटे के भीतर दो प्रसूताओं की मौत हो गई।सवनिया निवासी लक्ष्मी गंभीर एनीमिया से पीड़ित थीं, जबकि कानेला निवासी लीला की मौत उच्च रक्तचाप (बीपी) बढ़ने के कारण हुई। दोनों महिलाओं ने पहली बार बच्चे को जन्म दिया था।

घटना के बाद अस्पताल प्रशासन ने जांच के लिए पांच डॉक्टरों की टीम गठित की है। साथ ही पोस्ट-ऑपरेटिव वार्ड में इस्तेमाल किए गए तीन इंजेक्शनों के सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं।

दो और मौतों की भी चर्चा

अस्पताल से जुड़े सूत्रों का दावा है कि हाल के दिनों में दो अन्य प्रसूताओं की भी मौत हुई है। इनमें एक महिला की मौत ऑपरेशन के बाद हुई, जबकि दूसरी गर्भवती की इमरजेंसी में भर्ती होने के बाद आईसीयू में मौत हो गई। हालांकि अस्पताल प्रशासन ने इन दोनों मामलों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

राजस्थान में हाल के महीनों में प्रसूताओं की मौत के कई मामले सामने आए हैं। मई में कोटा में पांच प्रसूताओं की मौत हुई थी, जबकि जून में बीकानेर में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद छह महिलाओं की किडनी फेल होने का मामला सामने आया था, जिनमें से दो की इलाज के दौरान मौत हो गई थी।

लगातार सामने आ रहे इन मामलों ने सरकारी अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण, स्टरलाइजेशन व्यवस्था और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब भीलवाड़ा और बांसवाड़ा की घटनाओं की जांच रिपोर्ट का इंतजार है, जिससे मौतों के वास्तविक कारण स्पष्ट हो सकेंगे।