एक तरफ जहां कांग्रेस सांसद राहुल गांधी 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में स्टैंड-अप कॉमेडियन पुलकित मणि के साथ मिमिक्री कर तालियां बटोर रहे थे, ठीक उसी वक्त दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के नॉर्थ कैंपस में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति के नीचे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) अपनी शानदार जीत का जश्न मना रही थी।
पिछले कुछ दिनों से डीयू के नॉर्थ और साउथ कैंपस में 2012 के बाद का सबसे कड़ा छात्र संघ चुनाव लड़ा जा रहा था। लेकिन जब शनिवार को नतीजे घोषित हुए, तो ABVP ने नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) को करारी मात दी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी की युवाओं को लुभाने की कोशिश उनके अपने ही गढ़ में नाकाम हो गई है? आइए चुनाव के आंकड़ों और रणनीतियों के जरिए इसे समझते हैं।
धड़ाम हुआ NSUI का नया 'कास्ट एक्सपेरिमेंट'
2025 के चुनाव में NSUI ने केवल एक सीट (उपाध्यक्ष) जीती थी, लेकिन इस बार उनका स्कोर शून्य (Zero) पर सिमट गया। रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि 'छात्रों की गूंज' का असर डीयू की जातिगत राजनीति को भेदने में सफल रहेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
पिछले चुनाव में NSUI ने दो जाट और दो गुर्जर उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। लेकिन इस बार एक नया प्रयोग करते हुए दलित चेहरे विजय मीना को अध्यक्ष पद के लिए, पंजाबी चेहरे वीर चतरथ को उपाध्यक्ष, जाट उम्मीदवार नम्रता चौधरी को सचिव और एक अन्य जाट गोपाल चौधरी को संयुक्त सचिव पद के लिए टिकट दिया गया।
यानी दो जाट, एक पंजाबी और एक दलित का समीकरण बनाया गया। लेकिन पार्टी के दो बागियों- दीपांशु शौकीन और विशेष यादव ने इस पूरी रणनीति पर पानी फेर दिया और डीयू में NSUI की 'गूंज' खामोशी में बदल गई।
घटता वोट शेयर और 'नोटा' (NOTA) ने खोली पोल 'छात्रों की गूंज' की विफलता को पिछले और इस साल के वोट प्रतिशत से भी समझा जा सकता है। 2025 में उपाध्यक्ष पद के लिए एनएसयूआई के राहुल झांसी ने लगभग 29,300 वोट हासिल किए थे। वहीं इस बार अध्यक्ष पद के उम्मीदवार विजय मीना को महज 21,390 वोटों से ही संतोष करना पड़ा।
यह चुनाव यह भी दिखाता है कि NSUI छात्र राजनीति में ABVP से लगातार पिछड़ रही है। बेहतरीन उम्मीदवार उतारने और छात्रों के असल मुद्दों को उठाने में विफलता साफ नजर आ रही है, जिसकी गवाही 'नोटा' के आंकड़े दे रहे हैं। पिछले चुनाव में नोटा को 23,674 वोट मिले थे, जो इस बार बढ़कर 23,942 हो गए।
जमीन से जुड़े नेताओं की अनदेखी पड़ी भारी
NSUI ने नीट (NEET) परीक्षा विवाद और सत्य निकेतन पीजी हादसे जैसे बड़े मुद्दों को जोर-शोर से उठाया, लेकिन उन नेताओं को दरकिनार कर दिया जिन्होंने असल में इसके लिए संघर्ष किया था। छात्र नेता दीपांशु शौकीन, जिन्होंने नीट परीक्षा के खिलाफ प्रदर्शन किया था और सत्य निकेतन त्रासदी पर नंगे पैर मार्च निकाला था, उन्हें साइडलाइन कर दिया गया।
इससे डीयू कैंपस में यह सीधा संदेश गया कि NSUI असल संघर्ष करने वाले छात्र नेताओं के बजाय बड़े नेताओं के करीबियों को तरजीह देती है।
क्या कांग्रेस लेगी कोई सबक?
NSUI के लिए इस चुनाव में एकमात्र सकारात्मक पहलू यह रहा कि उसने पारंपरिक जाट राजनीति से ऊपर उठकर अध्यक्ष पद के लिए एक दलित उम्मीदवार को मैदान में उतारा। हालांकि चुनाव में मिली करारी हार के बाद, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस पार्टी इस छात्र संघ चुनाव के नतीजों से कोई ठोस सबक लेती है या नहीं।