जैसलमेर: जैसलमेर में एक 'तिरंगा यात्रा' को लेकर उठा विवाद आखिरकार एक बड़े सियासी और प्रशासनिक मोड़ पर आकर थम गया है। पिछले 6 दिनों से पुलिस थाने के बाहर डटे छात्र नेताओं की जिद के आगे आखिरकार महकमे को झुकना ही पड़ा। देर रात जैसे ही थानाधिकारी का ट्रांसफर ऑर्डर जारी हुआ, थाने के बाहर जारी अनशन और धरना-प्रदर्शन तुरंत समेट लिया गया।
क्या था पूरा विवाद?
बात कारगिल विजय दिवस की है, जब एबीवीपी के कुछ कार्यकर्ता शहर में देश भक्ति यात्रा निकालने की परमिशन लेने कोतवाली पहुंचे थे। कार्यकर्ताओं का दावा था कि थाने में मौजूद SHO और उनके स्टाफ ने मदद करने के बजाय उनके साथ बदसलूकी और धक्का-मुक्की की। इसी बात से नाराज होकर युवाओं ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सीधे थाने के सामने ही तंबू गाड़कर भूख हड़ताल पर बैठ गए।
आरोपों का दौर और दो फाड़ हुआ शहर
इस पूरे वाकये के बाद मामला सिर्फ छात्रों और पुलिस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरा शहर दो गुटों में बंट गया:
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पुलिस का पक्ष: एसपी ने साफ कहा कि आरोप झूठे हैं, क्योंकि यात्रा की मंजूरी उसी दिन दे दी गई थी।
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पुलिस के समर्थन में माहौल: पूर्व पुलिसकर्मियों के संगठन और एनएसयूआई ने अफसर का बचाव किया। सोशल मीडिया पर भी थानाधिकारी के समर्थन में पोस्ट तैरने लगे।
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नेताओं की एंट्री: दूसरी तरफ स्थानीय बीजेपी विधायक और संगठन के बड़े नेता लगातार धरने पर बैठे छात्रों की पैरवी करते दिखे।
देर रात की लिस्ट और 350 KM दूर तबादला
लगातार बढ़ते दबाव के बीच शनिवार देर रात जोधपुर रेंज से पुलिस अधिकारियों के तबादले की एक सूची सामने आई। इसमें जैसलमेर कोतवाली के थानाधिकारी का नाम शामिल था और उन्हें तुरंत प्रभाव से पाली भेज दिया गया। छात्र हालांकि पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने की मांग कर रहे थे, लेकिन दूर-दराज ट्रांसफर होने की खबर मिलते ही उन्होंने अपना रुख नरम कर लिया। इसके बाद वरिष्ठ नेताओं ने जूस पिलाकर अनशन पर बैठे छात्र नेताओं की हड़ताल खत्म कराई।
समझौता हुआ है या कोई नया तूफान आने वाला है?
6 दिन तक चले इस लंबे ड्रामे का अंत भले ही एक ट्रांसफर ऑर्डर से हो गया हो, लेकिन इस घटना ने खाकी की कार्यप्रणाली और राजनीतिक प्रभाव पर कई गंभीर सवाल छोड़ दिए हैं। अगर थानाधिकारी अपनी जगह सही थे और नियमानुसार काम कर रहे थे, तो फिर रातों-रात 350 किलोमीटर दूर उनका तबादला क्यों किया गया? क्या यह फैसला निष्पक्ष जांच के बाद हुआ या सिर्फ आंदोलन दबाने का प्रशासनिक पैंतरा? और सबसे बड़ा सवाल यह कि पुलिस वेलफेयर संगठन जो इस कार्रवाई का विरोध कर रहा था, क्या वह इस तबादले को खामोशी से स्वीकार करेगा या मामला कोई नया तूल पकड़ेगा? इस खाकी बनाम सियासत की जंग की अगली कड़ी क्या होगी, इसका जवाब वक्त ही देगा।