राजस्थान की जोजरी नदी में लगातार बढ़ रहे खतरनाक प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने पर्यावरण को हो रहे गंभीर नुकसान को देखते हुए नदी के किनारे 100 मीटर तक के दायरे में किसी भी प्रकार के निर्माण या विकास गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए राजस्थान सरकार और संबंधित प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक 'हाई फ्लड लाइन' और 'इकोलॉजिकल बफर जोन' की सीमाएं तय करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक नदी के इकोसिस्टम की सुरक्षा के लिए यह अंतरिम दायरा लागू रहेगा।

विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट ने खोली दावों की पोल

इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने हाल ही में अपनी दूसरी रिपोर्ट पेश की है। पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संगीत लोढ़ा की अध्यक्षता वाली इस समिति ने स्थल निरीक्षण के बाद कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं:

  • अत्यधिक अम्लीय जल: जोजरी नदी का पानी अभी भी बेहद अम्लीय (Acidic) है और कई हिस्सों से तेज दुर्गंध आ रही है।

  • सफाई अभियान नाकाफी: रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि मौजूदा सफाई अभियान पर्याप्त नहीं हैं।

  • अपशिष्ट निकासी पर रोक जरूरी: जब तक सभी वैध और अवैध औद्योगिक अपशिष्ट निकासी (Industrial Waste Discharge) बिंदुओं की पहचान कर उन्हें पूरी तरह बंद या नियंत्रित नहीं किया जाता, तब तक प्रदूषण की समस्या हल नहीं होगी।

"ट्रीटेड पानी की एक बूंद भी नदी में नहीं जानी चाहिए"

सुप्रीम कोर्ट ने इस औद्योगिक प्रदूषण के मामले में पिछले साल सितंबर-2025 में स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत की मुख्य चिंता औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले जहरीले कचरे और इससे नदी के साथ-साथ आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर है।

इससे पहले 4 अगस्त को हुई सुनवाई में भी अदालत ने सख्त लहजे में कहा था कि औद्योगिक कचरा तो दूर, ट्रीटेड पानी की एक बूंद भी जोजरी नदी में नहीं जानी चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को नदी के किनारे से अतिक्रमण हटाने और नदी क्षेत्रों की स्पष्ट मार्किंग करने के उपायों पर तेजी से काम करने के निर्देश दिए हैं।