राजस्थान में पंचायत और नगर निकायों का कार्यकाल समाप्त हुए लंबा समय बीत चुका है, लेकिन अब तक चुनाव नहीं होने से ग्रामीण और शहरी स्थानीय स्वशासन व्यवस्था प्रभावी रूप से प्रभावित हो रही है। राजस्थान हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए हैं, फिर भी चुनाव कार्यक्रम की घोषणा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।

राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का निर्धारण होने के बाद ही अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और महिला आरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। ऐसे में चुनाव की तारीखों को लेकर असमंजस और गहरा गया है।

हाईकोर्ट ने पहले भी दी थी डेडलाइन

राजस्थान हाईकोर्ट ने पिछले वर्ष नवंबर में 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने की समय सीमा तय की थी। हालांकि राज्य सरकार ने समय बढ़ाने का अनुरोध किया, जिस पर अदालत ने राहत देते हुए नई डेडलाइन 31 जुलाई निर्धारित कर दी। इसके बावजूद चुनावी प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में ही दिखाई दे रही है।

आयोग, सरकार और ओबीसी आयोग के बीच उलझी प्रक्रिया

चुनाव को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग, अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग और राज्य सरकार के बीच जिम्मेदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

  • राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची जारी कर चुका है और एक जून को पंचायती राज एवं स्वायत्त शासन विभाग से एससी, एसटी, ओबीसी और महिला आरक्षण की जानकारी मांगी है।

  • अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने 4 जून को सभी जिला कलक्टरों से ओबीसी परिवारों के सर्वे के लिए कार्मिकों की अद्यतन जानकारी मांगी।

  • राज्य सरकार ने निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर कहा है कि ओबीसी आरक्षण तय होने के बाद ही अन्य आरक्षण श्रेणियों का निर्धारण किया जा सकेगा।

इस बीच हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद चुनाव नहीं कराने के मुद्दे पर पूर्व विधायक संयम लोढ़ा सहित अन्य लोगों ने अवमानना याचिका दायर की है। याचिका में राज्य निर्वाचन आयुक्त और आयोग के सचिव के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में जारी है।

पूर्व निर्वाचन आयुक्त ने उठाए सवाल

पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त मधुकर गुप्ता ने कहा कि पंचायत और निकाय चुनाव आम जनता के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने संसद और विधानसभा चुनाव। उन्होंने कहा कि चुनाव कराना आयोग का संवैधानिक दायित्व है और इसके लिए सरकार पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, केरल, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में भी ऐसी परिस्थितियां बनी थीं, लेकिन न्यायालय की सख्ती के बाद चुनाव कराए गए। पंजाब में संसाधनों की कमी के बावजूद आयोग ने बैलेट बॉक्स के माध्यम से चुनाव संपन्न कराए थे।

समय पर चुनाव नहीं होना असंवैधानिक

पूर्व मुख्य सचिव एवं पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त इंद्रजीत खन्ना ने कहा कि पंचायत और निकाय चुनाव समय पर नहीं होना अपने आप में असंवैधानिक स्थिति है। उन्होंने कहा कि अब अदालत को संवैधानिक प्रावधानों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए स्पष्ट हस्तक्षेप करना चाहिए, ताकि लंबे समय से जारी असमंजस समाप्त हो सके।

राजस्थान में अब सबकी नजरें राज्य निर्वाचन आयोग की अधिसूचना, ओबीसी आरक्षण रिपोर्ट और हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। इन तीनों के आधार पर ही प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव की तस्वीर साफ हो सकेगी।