नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण और खनन गतिविधियों के नियमन को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने अरावली पर्वतमाला की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा तय करने के लिए एक पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति का उद्देश्य भविष्य में अरावली क्षेत्र में होने वाली खनन गतिविधियों को स्पष्ट और नियंत्रित ढांचे में लाना है।

समिति की अध्यक्ष कौन?

इस समिति की अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) की महानिदेशक कंचन देवी करेंगी। यह समिति वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक दृष्टिकोण से अरावली क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करेगी।

समिति के अन्य सदस्य

इस पांच सदस्यीय पैनल में देश के कई अनुभवी विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं—

  • डॉ. सुभाष आशुतोष (पूर्व महानिदेशक, भारतीय वन सर्वेक्षण)
  • डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा (पूर्व निदेशक, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण)
  • बृज मोहन सिंह राठौर (पूर्व संयुक्त सचिव, पर्यावरण मंत्रालय)
  • प्रोफेसर अशोक के भटनागर (पूर्व विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, दिल्ली विश्वविद्यालय)

अरावली पर व्यापक अध्ययन का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि समिति को ऐसा अध्ययन करना होगा जो वैज्ञानिक रूप से मजबूत और पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों पर आधारित हो। इसके साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि सभी हितधारकों की राय ली जाए।

इसमें शामिल होंगे—

  • राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली सरकारें
  • पर्यावरणविद और एनजीओ
  • खनन पट्टा धारक
  • परियोजना प्रस्तावक
  • ग्रामीण और किसान समुदाय
  • वे स्थानीय लोग जिनकी आजीविका अरावली से जुड़ी है

खनन पर अस्थायी रोक

सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश देते हुए कहा है कि समिति की अंतिम रिपोर्ट और उस पर विचार होने तक पूरे अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि पर रोक रहेगी। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण और अनियंत्रित खनन पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अगली सुनवाई

इस मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को निर्धारित की गई है। कोर्ट यह देखेगा कि समिति की रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई किस दिशा में जाती है।