उदयपुर, 20 दिसंबर 2025: राजस्थान के उदयपुर में अरावली पर्वतमाला को बचाने की मुहिम लगातार जोर पकड़ रही है। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के उस फैसले के बाद, जिसमें अरावली की परिभाषा बदलकर केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही संरक्षित क्षेत्र माना गया है, पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस फैसले से अरावली की लगभग 90% पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिससे खनन और निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है। उदयपुर सहित मेवाड़ क्षेत्र में यह मुद्दा विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि अरावली यहां की पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और जल सुरक्षा की रीढ़ है। 

शनिवार को अधिवक्ता परिषद और बार एसोसिएशन के बैनर तले बड़ी संख्या में वकीलों ने सड़कों पर उतरकर जोरदार प्रदर्शन किया। सुबह कोर्ट परिसर से शुरू हुई रैली में नारे लगाते हुए वकील जिला कलेक्ट्रेट पहुंचे। शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताते हुए उन्होंने राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) दीपेंद्र सिंह को सौंपा। ज्ञापन में अरावली के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई। वकीलों का कहना था कि "अरावली सुरक्षित रहेगी तो ही राजस्थान और उदयपुर का भविष्य सुरक्षित रहेगा"। कलेक्ट्रेट के बाहर आयोजित सभा में वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि मेवाड़ की पहचान, पर्यावरण की ढाल और जल की जीवनरेखा है। अगर अरावली कमजोर हुई तो मौसम असंतुलित होगा, बारिश घटेगी, भूजल स्तर गिरेगा और आने वाली पीढ़ियां गंभीर संकट का सामना करेंगी। 

बार एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र जैन ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं। सरकार से अपील की गई कि अरावली से जुड़े फैसले स्थानीय भावनाओं और पर्यावरण को ध्यान में रखकर लिए जाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ी तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा और प्रदेश स्तर पर आवाज उठाई जाएगी।

सभा को अधिवक्ता परिषद के जिला अध्यक्ष मनीष शर्मा, पूर्व अध्यक्ष रमेश नंदवाना, शंभू सिंह राठौड़, राव रतन सिंह, विष्णु शंकर पालीवाल, वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश सिंघवी, चक्रवर्ती सिंह राव, चंद्रभान सिंह शक्तावत, राकेश मोगरा, राम कृपा शर्मा और कमलेश दवे सहित कई वक्ताओं ने संबोधित किया। बड़ी संख्या में युवा वकील भी मौजूद रहे और सभी ने एक स्वर में अरावली बचाओ का नारा बुलंद किया।

यह प्रदर्शन कोई अकेली घटना नहीं है। इससे एक दिन पहले कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी इसी मुद्दे पर विरोध जताया था। पूरे राजस्थान में, खासकर उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा जैसे जिलों में सामाजिक संगठन, पर्यावरणविद्, राजनीतिक दल और आम जनता सड़कों पर उतर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी #SaveAravalli कैंपेन का समर्थन किया है और सुप्रीम कोर्ट व केंद्र सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की अपील की है।

अरावली क्यों इतनी महत्वपूर्ण? अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो थार मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है। यह उत्तर भारत की "फेफड़ों" की तरह काम करती है – धूल भरी आंधियां रोकती है, बारिश को प्रभावित करती है, भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता को संरक्षित रखती है। उदयपुर जैसे क्षेत्रों में यह झीलों और जल स्रोतों की जीवनरेखा है। अगर अरावली नष्ट हुई तो राजस्थान में रेगिस्तानीकरण तेज होगा, तापमान बढ़ेगा, दिल्ली-एनसीआर की वायु प्रदूषण समस्या और गंभीर हो जाएगी। यह मुहिम अब जन आंदोलन का रूप ले रही है। उदयपुर के लोग, वकील से लेकर आम नागरिक तक, एकजुट होकर कह रहे हैं – अरावली बचेगी तो हम बचेंगे। सरकार और न्यायालय से उम्मीद है कि जनभावनाओं का सम्मान करते हुए अरावली की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।