राजस्थान के पश्चिमी जिलों में एक बार फिर कुदरत का कहर देखने को मिल रहा है। लगातार आठ साल बाद बाड़मेर, जैसलमेर और बालोतरा जिलों में भीषण अकाल ने दस्तक दी है। किसानों की आंखों के सामने उनकी मेहनत जल कर खाक हो गई है और खेत बर्बादी का मंजर पेश कर रहे हैं। इन तीनों जिलों में रोजगार, पेयजल और पशुओं के चारे का इतना बड़ा संकट खड़ा हो गया है कि आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

कृषि विभाग की प्रारंभिक रिपोर्ट: आंकड़े डराने वाले हैं

गिरदावरी रिपोर्ट आने से पहले ही कृषि विभाग की प्रारंभिक रिपोर्ट ने हालात की गंभीरता को उजागर कर दिया है। आंकड़ों पर गौर करें तो:

  • बाड़मेर: सबसे ज्यादा 2460 गांव अकाल की चपेट में हैं। यहां की लगभग 88 फीसदी आबादी इस भीषण सूखे से प्रभावित हुई है।

  • बालोतरा: इस नए जिले के भी 1216 गांव सूखे की मार झेल रहे हैं।

  • जैसलमेर: पड़ोसी जिले जैसलमेर के 961 गांव भी अकाल की चपेट में आ गए हैं।

मानसून ने दिया धोखा: अगस्त-सितंबर रहे पूरे सूखे

सूखे की असली वजह मानसून का अचानक रूठ जाना है। जुलाई महीने की शुरुआती बारिश के बाद किसानों ने अपने खेतों में बाजरा, ग्वार, मूंग, मोठ और तिल की बुवाई कर दी थी। पसीने से सींची जमीन से कोंपलें अंकुरित हुईं, लेकिन अगस्त और सितंबर के महीने बिना एक बूंद बरसे ही बीत गए।

जहां औसत बारिश 387 एमएम होनी चाहिए थी, वहां अब तक महज 207 एमएम बारिश ही दर्ज की गई है (औसत से 180 एमएम कम)। पानी की एक-एक बूंद को तरसती फसलें किसानों के देखते ही देखते मुरझा कर जमींदोज हो गई हैं। दूधोड़ा गांव के हसन खां और पोकरण के सवाई सिंह सोढ़ा जैसे किसानों का कहना है कि बॉर्डर के गांवों में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।

1200 रुपये प्रति मण बिका चारा, पशुधन पर बड़ा खतरा

अकाल का सबसे बड़ा असर पशुधन पर पड़ रहा है। खेतों में पशुओं के चरने के लिए एक तिनका भी नहीं बचा है। हालात ये हैं कि चारे का भाव 1200 रुपये प्रति मण तक पहुंच गया है, जो आम पशुपालक के बजट से बाहर है। बॉर्डर एरिया वाले गांवों में जहां सबसे ज्यादा गोवंश है, वहां चारे के अभाव में पशु मौत के मुहाने पर हैं। सर्दियों की दस्तक से पहले ही गांव वालों को पेयजल के लिए ग्रामीण टैंकरों पर निर्भर होना पड़ रहा है।

एक्सपर्ट व्यू: ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट

कृषि विशेषज्ञ के मुताबिक, यह आठ साल बाद आया अकाल सिर्फ एक मौसमी असंतुलन नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुधन आधारित जीवनशैली के अस्तित्व के लिए एक बहुत बड़ा संकट है। मानसून के पैटर्न में आ रहे इन गंभीर बदलावों ने किसानों की लागत और उम्मीदों दोनों को जमींदोज कर दिया है।

सरकार से मांगी जा रही हैं ये 3 राहत

इस भयंकर संकट से निपटने के लिए सरकार से तुरंत प्रभाव से इन 3 कदमों की मांग की जा रही है:

  1. त्वरित आपदा राहत (अकाल घोषणा): प्रभावित क्षेत्रों को तत्काल अकाल घोषित कर मनरेगा के तहत मानव-दिवस बढ़ाए जाएं ताकि रोजगार सुरक्षा मिले।

  2. पशु संरक्षण शिविर: गोवंश और पशुधन को बचाने के लिए सरकारी अनुदान पर तुरंत चारा डिपो और पशु शिविर शुरू किए जाएं।

  3. निशुल्क पेयजल आपूर्ति: सूखे तालाबों वाले गांवों में टैंकरों के माध्यम से नियमित और निशुल्क जलापूर्ति सुनिश्चित हो।