अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट में एक नया बिल पेश किया गया है, जिसमें भारत, चीन समेत पांच देशों से आने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस बिल का उद्देश्य रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को कम करना और यूक्रेन युद्ध के लिए मिलने वाली आर्थिक मदद को कमजोर करना बताया गया है।
हालांकि, यह अभी सिर्फ एक प्रस्तावित विधेयक है। इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी सीनेट, प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और अंत में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना आवश्यक है।
किन देशों पर लागू हो सकता है प्रस्तावित टैरिफ?
प्रस्तावित बिल में भारत, चीन, हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान जैसे देशों को शामिल किया गया है। इन देशों पर 100% तक आयात शुल्क लगाने का प्रावधान रखा गया है, क्योंकि अमेरिका का मानना है कि ये देश रूस से ऊर्जा खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं।
बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया।
भारत ने जून में रूस से खरीदा रिकॉर्ड तेल
ऊर्जा आयात के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया। यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 52.4% था।
मई की तुलना में जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की वृद्धि दर्ज की गई। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
यूरोपीय देशों को क्यों मिली राहत?
बिल में 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से छूट देने का प्रावधान रखा गया है। अमेरिका का कहना है कि ये देश रूस से 15% से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं।
डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं, बल्कि उन देशों के खिलाफ है जो अब भी रूस के ऊर्जा कारोबार को आर्थिक सहारा दे रहे हैं।
रूस पर और भी सख्त प्रतिबंधों का प्रस्ताव
बिल में सिर्फ टैरिफ ही नहीं, बल्कि रूस के ऊर्जा क्षेत्र, वित्तीय संस्थानों, रक्षा उद्योग, बड़े कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का भी प्रस्ताव शामिल है।
दोनों दलों का मिला समर्थन
इस विधेयक को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट—दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है। अमेरिका में ऐसे प्रस्तावों को बाइपार्टिसन बिल कहा जाता है। दोनों दलों के समर्थन के कारण इसके आगे बढ़ने की संभावना पहले की तुलना में अधिक मानी जा रही है।
हालांकि, कानून बनने से पहले इसे सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों से पारित होना होगा, जिसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर आवश्यक होंगे।
बिल क्यों लाया गया?
अमेरिका का मानना है कि रूस की तेल और गैस से होने वाली आय यूक्रेन युद्ध के लिए सबसे बड़ा आर्थिक स्रोत है। इसी वजह से यह बिल उन देशों पर भी दबाव बनाने की कोशिश करता है जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीद रहे हैं।
समर्थकों का कहना है कि यदि रूस की ऊर्जा आय कम होती है तो उस पर युद्ध समाप्त करने और शांति वार्ता की दिशा में आगे बढ़ने का दबाव बढ़ सकता है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि यह बिल मौजूदा स्वरूप में कानून बनता है, तो अमेरिका को भारत से निर्यात होने वाले कई उत्पादों पर 100% तक आयात शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है। इससे भारत-अमेरिका व्यापार पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि, फिलहाल यह केवल एक प्रस्तावित विधेयक है और इसके अंतिम रूप तथा लागू होने से पहले कई संवैधानिक प्रक्रियाएं बाकी हैं।