ऑटोमोबाइल उद्योग में एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) तेजी से नई पहचान बना रहा है। पहले यह तकनीक केवल प्रीमियम और लग्जरी कारों तक सीमित थी, लेकिन अब मिड-रेंज वाहनों में भी एडेप्टिव क्रूज़ कंट्रोल, लेन-कीप असिस्ट, ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग और ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग जैसे फीचर्स देखने को मिल रहे हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं को कम करना और ड्राइविंग को अधिक सुरक्षित एवं आरामदायक बनाना है।
ADAS सिस्टम कैमरा, रडार, अल्ट्रासोनिक सेंसर और कई मामलों में LiDAR जैसी तकनीकों का उपयोग करके वाहन के आसपास की स्थिति का लगातार विश्लेषण करता है। यदि वाहन लेन से बाहर जाने लगता है, सामने अचानक कोई बाधा आती है या किसी वाहन से टक्कर का खतरा बनता है, तो सिस्टम ड्राइवर को चेतावनी देता है और जरूरत पड़ने पर खुद भी हस्तक्षेप कर सकता है।
वर्तमान में दुनिया के कई वाहन निर्माता लेवल 3 और लेवल 4 ऑटोनॉमस (Self-Driving) तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं। लेवल 3 में वाहन कुछ परिस्थितियों में स्वयं ड्राइव कर सकता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर ड्राइवर को नियंत्रण संभालना होता है। वहीं लेवल 4 तकनीक सीमित क्षेत्रों और निर्धारित परिस्थितियों में लगभग पूरी तरह स्वायत्त ड्राइविंग की क्षमता प्रदान करती है।
एडेप्टिव क्रूज़ कंट्रोल लंबी यात्राओं को अधिक आरामदायक बनाता है। यह सिस्टम आगे चल रहे वाहन से सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए वाहन की गति को स्वतः नियंत्रित करता है। वहीं लेन-कीप असिस्ट सड़क की लेन पहचानकर वाहन को उसी लेन में बनाए रखने में मदद करता है, जिससे हाईवे पर दुर्घटनाओं की संभावना कम होती है।
आने वाले वर्षों में ADAS तकनीक और अधिक उन्नत होगी। बेहतर सेंसर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाई-डेफिनिशन मैपिंग के साथ भविष्य की कारें पहले से कहीं अधिक सुरक्षित, स्मार्ट और स्वचालित होंगी। हालांकि, पूरी तरह सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों के व्यापक उपयोग के लिए मजबूत नियम, विश्वसनीय इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा जैसे पहलुओं पर भी लगातार काम किया जा रहा है।