दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास स्थित सत्य निकेतन (Satya Niketan) इलाके में रविवार को एक बड़ा और दर्दनाक हादसा हो गया। यहां दोपहर करीब 1:30 बजे एक 5 मंजिला इमारत भरभरा कर गिर गई। इस 40-50 साल पुरानी इमारत में 'हॉस्टल डेज' (Hostel Days) नाम से लड़कों का पीजी चलता था। हादसे के वक्त ज्यादातर छात्र अपने कमरों में आराम कर रहे थे।

एम्स ट्रॉमा सेंटर (AIIMS Trauma Centre) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस हादसे में अब तक 2 छात्रों की मौत हो चुकी है, जबकि 3 की हालत बेहद गंभीर बनी हुई है। घटनास्थल पर एनडीआरएफ (NDRF), दमकल विभाग और पुलिस की टीमें युद्धस्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही हैं।

हादसे की मुख्य बातें (Key Highlights)

  • क्षमता और छात्र: बिल्डिंग में 20-25 कमरे थे और हर कमरे में 2 छात्र रहते थे। हादसे के वक्त अंदर करीब 50 लोग मौजूद होने की आशंका है।

  • कैजुअल्टी: मलबे से निकाले गए 7 लोगों को एम्स ट्रॉमा सेंटर और 1 को सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। एम्स में 2 छात्रों को मृत घोषित कर दिया गया है।

  • रेस्क्यू ऑपरेशन: अब तक 10 से 15 छात्रों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है। एक छात्र ने मलबे के अंदर से ही वीडियो बनाकर रेस्क्यू की गुहार लगाई, जिसके बाद उसे बाहर निकाल लिया गया।

  • खतरे की जद में दूसरी इमारत: मलबे के ठीक बगल में स्थित एक अन्य इमारत भी गिरने की कगार पर है (कुछ चश्मदीदों के अनुसार वह भी गिर गई है), जिसे तुरंत खाली करा लिया गया है।

क्यों गिरी 5 मंजिला इमारत? 

स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों के अनुसार, इस दर्दनाक हादसे के पीछे 4 प्रमुख वजहें सामने आ रही हैं:

  1. बेसमेंट की खुदाई: पिछले 3 दिनों से इस 40-50 साल पुरानी इमारत के नीचे बेसमेंट बनाने के लिए खुदाई का काम चल रहा था, जिससे नींव पर सीधा असर पड़ा।

  2. कमजोर पिलर: चश्मदीदों का कहना है कि इमारत के निचले पिलर बहुत कमजोर थे और वे पूरी बिल्डिंग का भार नहीं सह सके।

  3. ढांचे से छेड़छाड़: निर्माण कार्य के दौरान पिलर या नींव में हुए बदलावों ने बिल्डिंग की बची-खुची मजबूती को भी खत्म कर दिया।

  4. पुरानी और जर्जर इमारत: इमारत पहले से ही काफी पुरानी थी और उस पर बेसमेंट खुदाई के अतिरिक्त दबाव ने इस हादसे को ट्रिगर कर दिया।

संकरी गलियों ने बढ़ाई रेस्क्यू में मुश्किलें

सत्य निकेतन छात्रों का प्रमुख इलाका है, जहां वेंकटेश्वर, आर्यभट्ट और मैत्रेयी जैसे कई प्रमुख कॉलेज हैं। यहां की गलियां बेहद संकरी हैं, जिसके कारण भारी मशीनों (क्रेन, जेसीबी) को अंदर ले जाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोग खुद हथौड़े और हाथों से एक-एक ईंट हटाकर दबे हुए छात्रों को निकालने की कोशिश कर रहे हैं। मलबे के नीचे कई गाड़ियां भी दब गई हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता मौके पर मौजूद हैं और रेस्क्यू ऑपरेशन की सीधी निगरानी कर रही हैं।

हादसे पर सियासी हलचल और नेताओं की प्रतिक्रियाएं

इस हृदयविदारक घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी और शोक संवेदनाओं का दौर भी शुरू हो गया है:

  • केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह: घटना की गंभीरता को देखते हुए गृह मंत्री ने अपना गोवा दौरा तुरंत रद्द कर दिया और हादसे पर गहरा दुख व्यक्त किया।

  • राहुल गांधी: उन्होंने हादसे को चिंताजनक बताते हुए कहा कि अच्छे हॉस्टल न होने के कारण छात्र पीजी में एक छत के नीचे 40-40 की संख्या में अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं।

  • अरविंद केजरीवाल: उन्होंने रेस्क्यू ऑपरेशन के जल्द पूरा होने की प्रार्थना की और सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार को नींद से जागना होगा।

  • स्थानीय विधायक: भाजपा विधायक कैलाश गहलोत और अनिल शर्मा ने इसे बेहद दुखद बताया और कहा कि आपदा प्रबंधन विभाग हर संभव मदद कर रहा है। डूसू अध्यक्ष आर्यन मान भी लगातार छात्रों के संपर्क में हैं।

दिल्ली में डराने वाले हैं बिल्डिंग गिरने के आंकड़े

राजधानी में इमारतों के ढहने का यह पहला मामला नहीं है। आंकड़े सिस्टम की गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करते हैं:

  • 2022 से 2025 तक: पिछले 3 सालों में दिल्ली में बिल्डिंग गिरने के 1,133 मामले सामने आए हैं, जिनमें 98 लोगों ने अपनी जान गंवाई है।

  • अवैध निर्माण का अंबार: 2015 से 17 मार्च 2025 के बीच एमसीडी (MCD) के 12 जोनों में 76,465 अवैध निर्माण के मामले दर्ज किए गए।

  • लापरवाह कार्रवाई: इनमें से सिर्फ 35,842 मामलों में कार्रवाई हुई। 11,903 संपत्तियां सील की गईं, लेकिन सील टूटने के बावजूद महज 683 संपत्तियों को ही दोबारा खोला गया, जबकि नियम के अनुसार सील तोड़ने पर सीधे FIR का प्रावधान है।

अवैध निर्माण की शिकायतें '311 ऐप', वेबसाइट या जोनल ऑफिस में की जा सकती हैं, जिसके बाद फील्ड इंस्पेक्शन और डीएमसी एक्ट (DMC Act) के तहत कार्रवाई होती है। हालांकि, सत्य निकेतन का यह हादसा एक बार फिर प्रशासन की मॉनिटरिंग और छात्रों की सुरक्षा पर कई गंभीर सवाल खड़े कर गया है।