भारत ने मलेरिया के खिलाफ अपनी लंबी लड़ाई में एक ऐतिहासिक और बड़ी कामयाबी हासिल की है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2015 से 2025 के बीच देश में मलेरिया के मामलों और इससे होने वाली मौतों में लगभग 80 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है। यह आंकड़ा न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी जीत है, बल्कि भारत के 2030 तक पूरी तरह 'मलेरिया-मुक्त' होने के लक्ष्य को भी मजबूती देता है।
हाल ही में सरकार द्वारा मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम (Malaria Elimination Programme) की एक उच्च-स्तरीय समीक्षा की गई। समीक्षा में सामने आया है कि कभी पूरे देश के लिए सिरदर्द रही यह बीमारी अब सिकुड़कर कुछ खास भौगोलिक क्षेत्रों तक सीमित हो गई है।
आंकड़ों में समझें भारत की बड़ी उपलब्धि
पिछले एक दशक में भारत का मलेरिया ग्राफ तेजी से नीचे आया है:
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80% की गिरावट: 2015 से 2025 के बीच मलेरिया के मामलों और मौतों में लगभग 80% की कमी आई है।
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155 से घटकर 33 हुए 'हाई-बर्डन' जिले: कभी देश के 155 जिले मलेरिया से बुरी तरह प्रभावित थे, जिनकी संख्या अब मात्र 33 रह गई है।
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160 जिलों में 'जीरो' केस: साल 2022 से 2025 के बीच देश के 160 जिलों में मलेरिया का एक भी स्वदेशी (स्थानीय स्तर पर फैला) मामला सामने नहीं आया है।
अब इन 33 जिलों पर है सबसे ज्यादा फोकस
भले ही पूरे देश में मलेरिया का ग्राफ गिरा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि खतरा टल गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में मलेरिया का सबसे ज्यादा प्रभाव 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 33 जिलों में सिमट गया है। साल 2025 में मलेरिया के 64% मामले और 54% मौतें इन्हीं 33 जिलों से दर्ज की गईं।
इन राज्यों में मिजोरम, ओडिशा, त्रिपुरा, असम, आंध्र प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर इलाके घने जंगलों वाले, आदिवासी बहुल और दुर्गम क्षेत्रों वाले हैं, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच एक बड़ी चुनौती है।
कैसे मिली यह कामयाबी?
भारत की इस सफलता के पीछे कोई एक कदम नहीं, बल्कि कई रणनीतियों का मिला-जुला असर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी भारत के प्रयासों की सराहना की है। इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
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कीटनाशक युक्त विशेष मच्छरदानियों (LLINs) का बड़े पैमाने पर वितरण।
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घरों के अंदर कीटनाशकों का छिड़काव (Indoor residual spraying)।
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समय पर सटीक जांच और आर्टेमिसिनिन-आधारित कॉम्बिनेशन थेरेपी (ACT) से पूरा इलाज।
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पूरे देश में एक ही नीति लागू करने के बजाय, संक्रमण वाले विशेष जिलों को टारगेट करके रणनीति बनाना।
'टेस्ट, ट्रीट और ट्रैक' है अगला बड़ा हथियार
सरकार का अगला लक्ष्य 2027 तक भारत को मलेरिया-मुक्त देखना और 2030 तक इसका पूर्ण उन्मूलन (Elimination) करना है। इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने 'टेस्ट, ट्रीट और ट्रैक' (जांच, इलाज और निगरानी) की रणनीति पर सबसे ज्यादा जोर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल लक्षणों के आधार पर मलेरिया की पहचान मुश्किल है। इसलिए रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्टिंग और लैबोरेटरी जांच को दुर्गम इलाकों तक पहुंचाना सबसे जरूरी है। संक्रमण की जल्द पहचान होने से न केवल मरीज की जान बचती है, बल्कि बीमारी को आगे फैलने से भी रोका जा सकता है।
लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी बीमारी के खात्मे का अंतिम चरण सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है। जब मामले कम हो जाते हैं, तो सर्विलांस (निगरानी) को और ज्यादा सतर्क करना पड़ता है ताकि छिपे हुए मामले भी पकड़ में आ सकें।
मलेरिया को पूरी तरह खत्म करने के लिए सिर्फ स्वास्थ्य विभाग ही नहीं, बल्कि ग्रामीण और शहरी विकास विभागों के साथ-साथ पंचायती राज संस्थाओं को भी मिलकर काम करना होगा। जलभराव रोकना, मच्छरों के पनपने की जगहों को नष्ट करना और पर्यावरण प्रबंधन अब मलेरिया के खिलाफ भारत की इस आखिरी लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।