चुनावी तैयारियों ने पकड़ी रफ्तार, आयोग हुआ सख्त

राजस्थान में काफी समय से लंबित चल रहे स्थानीय निकाय (Urban Bodies) और त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने इन चुनावों को जल्द से जल्द संपन्न कराने की दिशा में अपने कदम आगे बढ़ा दिए हैं। आयोग ने राज्य सरकार के दो प्रमुख विभागों— पंचायत राज विभाग और स्वायत्त शासन विभाग (DLB)— को कड़ा पत्र जारी कर आरक्षण से जुड़े नवीनतम और प्रमाणित आंकड़े तुरंत उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

आयोग का स्पष्ट मानना है कि जैसे ही सरकार की तरफ से यह आवश्यक डेटा मुहैया करा दिया जाएगा, चुनावी प्रक्रिया को अंतिम रूप देने और तारीखों के एलान की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जा सकेगा।

बिना आरक्षण डेटा के चुनाव कार्यक्रम संभव नहीं

राज्य निर्वाचन आयोग ने सरकार और संबंधित विभागों को भेजे पत्र में स्थिति साफ कर दी है। आयोग का कहना है कि पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में नियमों के मुताबिक आरक्षण का निर्धारण (Reservation Mapping) करना अनिवार्य है। जब तक विभागों द्वारा वार्ड और पंचायत स्तर पर आरक्षण की स्थिति स्पष्ट नहीं की जाती, तब तक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कार्यक्रम जारी करना पूरी तरह असंभव है।

आयोग ने विभागों को डेडलाइन का अहसास कराते हुए कहा है कि डेटा मिलते ही बिना किसी देरी के चुनावी तैयारियों के अगले चरण को अमलीजामा पहनाया जाएगा।

कोर्ट में आयोग की पेशी और ओबीसी आरक्षण का पेंच

स्थानीय चुनाव कराने में हो रही देरी का मामला पहले ही न्यायपालिका की चौखट तक पहुंच चुका है। चुनाव न कराए जाने को लेकर आयोग को माननीय न्यायालय में भी जवाबदेह होना पड़ा था।

हालांकि, इससे पहले राज्य सरकार की ओर से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण से संबंधित आयोग की रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। लेकिन निर्वाचन आयोग का तर्क है कि चुनावी प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत और निर्विवाद रखने के लिए केवल संदर्भ नहीं, बल्कि अंतिम और प्रमाणित (Certified) आंकड़ों की जरूरत होती है। यही वजह है कि आयोग ने एक बार फिर विस्तृत डेटा के लिए विभागों पर दबाव बनाया है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में बढ़ी सुगबुगाहट

राजस्थान में पंचायत राज और नगरीय निकायों का कार्यकाल पूरा होने के बावजूद चुनाव लंबे समय से लंबित हैं। प्रशासकों के भरोसे चल रही इन संस्थाओं में चुनावी बिगुल फूंकने की मांग लगातार उठ रही है। अब आयोग द्वारा दोबारा पत्र लिखे जाने के बाद प्रदेश के राजनीतिक दलों (भाजपा-कांग्रेस सहित अन्य) और स्थानीय नेताओं के बीच सरगर्मी बढ़ गई है।

अब पूरी गेंद राज्य सरकार के पाले में है। सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों संबंधित विभाग कितनी जल्दी निर्वाचन आयोग को यह प्रमाणित डेटा सौंपते हैं, क्योंकि सरकार के इसी जवाब और डेटा पर राजस्थान के स्थानीय लोकतंत्र के चुनावों की अगली दिशा और तारीखें तय होंगी।