जोधपुर:- सूरज की तपिश और किलों की भव्यता के बीच जोधपुर की सबसे बड़ी पहचान रही है उसका नीला रंग। यही वजह है कि पूरी दुनिया जोधपुर को ‘ब्लू सिटी’ के नाम से जानती है। लेकिन आधुनिकता, नए रंग-रोगन और बदलते शहरी रुझानों के चलते यह पहचान धीरे-धीरे फीकी पड़ती नजर आने लगी। इसी चिंता ने मरुस्थलीय संस्कृति से जुड़े युवाओं को एकजुट किया और जन्म हुआ ‘सेव ब्लू सिटी – सेव आइडेंटिटी’ मुहिम का।
पिछले करीब एक महीने से जोधपुर शहर में यह अभियान लगातार दिखाई दे रहा है। मरवाड़ के युवाओं ने बिना किसी सरकारी मदद के, अपनी जेब खर्च (पॉकेट मनी) से इस मुहिम को आगे बढ़ाया। युवाओं का उद्देश्य साफ है—
“जोधपुर की आन-बान-शान और उसकी ऐतिहासिक पहचान को बचाना।”
क्यों जरूरी है ‘सेव ब्लू सिटी’
युवाओं का कहना है कि नीला रंग सिर्फ रंग नहीं, बल्कि जोधपुर की संस्कृति, परंपरा और विरासत का प्रतीक है। पुराने शहर के नीले मकान न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी खास माने जाते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में कई जगहों पर नीले रंग की जगह अन्य आधुनिक रंगों का इस्तेमाल होने लगा, जिससे ब्लू सिटी की पहचान खतरे में पड़ती दिखी।
विरोध भी, समर्थन भी
जहां एक ओर बड़ी संख्या में लोग इस अभियान से जुड़ते नजर आए, वहीं कुछ वर्गों ने इसका विरोध भी किया। विरोध करने वालों का तर्क रहा कि यह पहल व्यवहारिक नहीं है या व्यक्तिगत पसंद पर रोक लगाने जैसी है।
हालांकि, युवाओं का कहना है कि यह किसी पर दबाव नहीं, बल्कि जागरूकता की मुहिम है, ताकि लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत के महत्व को समझ सकें।
विधायक रविंद्र सिंह भाटी बने युवाओं की ताकत
इस अभियान को उस वक्त नई ऊर्जा मिली जब शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी खुलकर युवाओं के समर्थन में सामने आए। विधायक भाटी ने कहा—
“आसमान का नीला रंग ही जोधपुर शहर की पहचान रहा है। यह पहचान हमें खटकने लगी थी क्योंकि यह धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। नीला रंग जोधपुर की सांस्कृतिक धरोहर है, इसे मिटने नहीं दिया जा सकता।”
उनके समर्थन से अभियान को न केवल नैतिक बल मिला, बल्कि यह मुद्दा आमजन और जनप्रतिनिधियों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया।
एक शहर, एक पहचान
‘सेव ब्लू सिटी’ मुहिम आज सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि युवाओं की सोच और शहर से प्रेम का प्रतीक बन चुकी है। यह पहल यह संदेश देती है कि विकास के साथ-साथ अपनी जड़ों और पहचान को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
जोधपुर की नीली छांव में पली-बढ़ी यह पहचान आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे, इसी उम्मीद के साथ युवा आज भी इस मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं।