राजस्थान में आगामी पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से जुड़ी एक अहम सर्वे रिपोर्ट सामने आई है। राजस्थान अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग की ओर से तैयार की गई इस विस्तृत रिपोर्ट में प्रदेश के 92 OBC समुदायों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का सर्वे किया गया है। इनमें सबसे पिछड़े वर्ग यानी MBC की श्रेणी में आने वाले पांच समुदाय भी शामिल हैं।

आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में OBC आबादी 3.63 करोड़ से ज्यादा है। रिपोर्ट में अलग-अलग समुदायों की आबादी, सरकारी नौकरियों में भागीदारी, स्वरोजगार, श्रम भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़े सामने रखे गए हैं। आगामी पंचायत और निकाय चुनावों में OBC आरक्षण तय करने के लिहाज से भी इस रिपोर्ट को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रिपोर्ट के सबसे अहम आंकड़ों में से एक यह है कि राजस्थान के सात प्रमुख OBC समुदाय मिलकर कुल OBC आबादी का 55.14 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं।

आबादी के लिहाज से जाट और जाट सिख सबसे बड़ा समूह है। रिपोर्ट में इनकी हिस्सेदारी 20.14 प्रतिशत बताई गई है। इसके बाद गुर्जर 9.11 प्रतिशत, कुम्हार-कुमावत 8.36 प्रतिशत और माली-सैनी-बागवान 7.80 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ प्रमुख समूह हैं।

इसके अलावा जांगिड़/सुथार की 3.49 प्रतिशत, यादव/अहीर की 3.22 प्रतिशत और मेव समुदाय की 3.02 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई गई है।

इन सात समुदायों को मिलाकर OBC आबादी का आधे से ज्यादा हिस्सा बनता है।

सर्वे रिपोर्ट में OBC समुदायों के सरकारी नौकरी में प्रतिनिधित्व को लेकर भी महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में करीब 3.92 लाख OBC सरकारी कर्मचारी हैं।

इनमें जाट, गुर्जर, सैनी और यादव समुदायों की हिस्सेदारी मिलाकर करीब 78 प्रतिशत बताई गई है। वहीं रिपोर्ट के अनुसार 18 OBC समुदाय ऐसे हैं, जिनमें से प्रत्येक के सरकारी सेवा में 100 से भी कम सदस्य हैं।

आयोग की रिपोर्ट में इन आंकड़ों के आधार पर OBC समुदायों के बीच सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व के बड़े अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया गया है।

12.50 लाख से ज्यादा लोग स्वरोजगार में

रिपोर्ट के मुताबिक OBC समुदायों के करीब 12.50 लाख लोग स्वरोजगार से जुड़े हुए हैं। इनमें कुम्हार-कुमावत समुदाय के करीब 1.24 लाख, जाट समुदाय के 1.21 लाख, माली-सैनी समुदाय के करीब 1.15 लाख और जांगिड़ समुदाय के 85,114 लोग स्वरोजगार में हैं।

सर्वे में श्रम और दिहाड़ी मजदूरी से जुड़े क्षेत्रों में भी OBC समुदायों की बड़ी भागीदारी दर्ज की गई है। खास तौर पर कुम्हार-कुमावत और सैनी समुदायों की इस क्षेत्र में उल्लेखनीय हिस्सेदारी सामने आई है।

OBC आबादी में पुरुषों की संख्या ज्यादा

आयोग के सर्वे में OBC आबादी से जुड़ा डेमोग्राफिक डेटा भी सामने रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार OBC आबादी में 1,87,50,094 पुरुष, यानी करीब 52.23 प्रतिशत हैं।

वहीं महिलाओं की संख्या 1,71,05,082, यानी करीब 47.76 प्रतिशत बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार OBC वर्ग में लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 914 महिलाएं है।

राजस्थान में होने वाले आगामी पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले यह रिपोर्ट राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आयोग ने यह सर्वे सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' फ्रेमवर्क के अनुसार तैयार किया है।

इसी आधार पर पंचायत और शहरी निकायों में OBC के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण से जुड़े फैसलों के लिए आंकड़े महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि OBC श्रेणी के अलग-अलग समुदायों की आबादी, आर्थिक स्थिति, सरकारी नौकरियों में भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में काफी अंतर है। ऐसे में सिर्फ कुल आबादी के आंकड़े के आधार पर स्थिति को समझना पर्याप्त नहीं होगा।

सर्वे के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि OBC वर्ग के भीतर ही अलग-अलग समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ बड़े समुदायों की सरकारी सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में मजबूत भागीदारी है, जबकि कुछ समुदायों का प्रतिनिधित्व काफी कम है।

आयोग की रिपोर्ट में ऐसे समुदायों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई गई है, जिनकी राजनीतिक और आर्थिक भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है। रिपोर्ट के निष्कर्ष समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत की ओर भी इशारा करते हैं।

राजस्थान में आगामी पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के मद्देनजर अब इस रिपोर्ट के आंकड़ों पर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा बढ़ने की संभावना है। OBC समुदायों की आबादी और उनके प्रतिनिधित्व से जुड़े ये आंकड़े स्थानीय निकायों में आरक्षण की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

कुल मिलाकर, आयोग की यह रिपोर्ट राजस्थान के OBC वर्ग के भीतर मौजूद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विविधता की तस्वीर सामने रखती है। अब देखना होगा कि रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों का आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और OBC आरक्षण की प्रक्रिया पर क्या असर पड़ता है।