राजस्थान के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में हाल के दिनों में प्रसूताओं की लगातार हुई मौतों के बाद राज्य सरकार और चिकित्सा विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गया है। इस गंभीर मुद्दे पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने सोमवार को जयपुर स्थित स्वास्थ्य भवन में प्रदेश के वरिष्ठ गायनोलॉजिस्ट विशेषज्ञों के साथ हाई-लेवल समीक्षा बैठक की।

बैठक में हालिया मामलों की विस्तार से समीक्षा करते हुए मंत्री ने कहा कि कोटा, बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा सहित कई जिलों में हुई अधिकांश मौतों के पीछे एनीमिया (खून की कमी), हाई ब्लड प्रेशर, प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (PPH) और कुपोषण जैसे गंभीर कारण जिम्मेदार रहे हैं।

उन्होंने बताया कि अधिकांश महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे अस्पतालों से गंभीर हालत में बड़े मेडिकल कॉलेजों में रेफर होकर पहुंची थीं, जहां डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।

मातृ मृत्यु दर में 25 प्रतिशत की कमी का दावा

स्वास्थ्य मंत्री ने बैठक में सरकारी आंकड़े भी साझा किए। उनके अनुसार राज्य में पिछले कुछ वर्षों में मातृ मृत्यु दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।

  • 2023-24: 1094 प्रसूताओं की मृत्यु
  • 2024-25: 986 मामले
  • 2025-26: 824 मामले

सरकार का दावा है कि वर्तमान कार्यकाल में मातृ मृत्यु के मामलों में करीब 25 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि हाल के दिनों में कम समय में हुई मौतों को मंत्री ने गंभीर चिंता का विषय माना।

पुराने मामलों का भी दिया उदाहरण

गजेंद्र सिंह खींवसर ने वर्ष 2011 में जोधपुर के उम्मेद अस्पताल में तीन दिनों के भीतर हुई 18 प्रसूताओं की मौत और जयपुर में 2011-12 के दौरान हुई आठ मौतों का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि उस समय संक्रमण और तकनीकी लापरवाही जैसे समान कारण सामने आए थे, जबकि वर्तमान मामलों में ऐसा कोई समान पैटर्न नहीं मिला है। हालिया सभी मरीज पहले से ही हाई रिस्क प्रेग्नेंसी श्रेणी में थीं।

हर केस की होगी ऑडिट

बैठक के दौरान मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, कोटा और बीकानेर के मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों और अस्पताल अधीक्षकों से सीधे बातचीत की।

उन्होंने हाल में हुई प्रत्येक प्रसूता की मौत की केस हिस्ट्री और ऑडिट रिपोर्ट की समीक्षा करते हुए डॉक्टरों से जवाब मांगा। साथ ही अस्पतालों में संक्रमण रोकने और सभी क्लीनिकल प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए।

बड़े अस्पताल निभाएंगे मेंटर की भूमिका

सरकार ने यह भी निर्णय लिया कि बड़े मेडिकल कॉलेज अब अपने अधीन आने वाले सीएचसी (CHC) और पीएचसी (PHC) के डॉक्टरों का मार्गदर्शन करेंगे।

इसका उद्देश्य हाई रिस्क गर्भावस्था की समय रहते पहचान करना और गंभीर मरीजों को समय पर बेहतर इलाज उपलब्ध कराना है।

आशा और एएनएम की होगी मॉनिटरिंग

स्वास्थ्य मंत्री ने वरिष्ठ गायनोलॉजिस्ट विशेषज्ञों को निर्देश दिए कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत आशा सहयोगिनियों और एएनएम द्वारा की जा रही प्रसव पूर्व जांच (ANC) की नियमित निगरानी करें, ताकि गर्भवती महिलाओं की स्थिति का समय रहते पता लगाया जा सके।

विशेषज्ञों ने दिए कई महत्वपूर्ण सुझाव

बैठक में मौजूद विशेषज्ञ डॉक्टरों ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए कई अहम सुझाव दिए।

  • बड़े अस्पतालों में ऑब्सटेट्रिक ICU की स्थापना।
  • लेबर रूम में भीड़ कम करने के लिए बेहतर व्यवस्था।
  • प्राथमिक स्तर पर एनीमिया का उपचार शुरू करने की व्यवस्था।
  • ऑपरेशन से पहले ECG सहित जरूरी जांच अनिवार्य करना।
  • प्रत्येक अस्पताल में रेफरल आउट रजिस्टर बनाए रखना ताकि मरीज की स्थिति का रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।

बैठक में प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य गायत्री राठौड़, मिशन निदेशक डॉ. जोगाराम, आयुक्त चिकित्सा शिक्षा बाबूलाल गोयल सहित प्रदेश के सभी प्रमुख मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य और पीएमओ मौजूद रहे।