16 से 18 हजार फीट की हाड़ कंपा देने वाली बर्फानी ऊंचाई... चारों तरफ गहरी खाइयां और सिर पर सीधे निशाने साधता दुश्मन! साल 1999 की तपती गर्मियों में जब पूरा देश चैन की नींद सो रहा था, तब कारगिल की बर्फीली पहाड़ियों पर भारत के जांबाज इतिहास का सबसे कठिन युद्ध लड़ रहे थे। पाकिस्तान को लगा था कि उसने 100 से ज्यादा चोटियों पर कब्जा करके भारत को बैकफुट पर धकेल दिया है। लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि भारतीय सेना के पास ऐसे वीर सिपाही हैं, जो भूखे-प्यासे रहकर भी मौत के मुंह से जीत छीन लाते हैं। ऐसी ही एक अनसुनी और दिल दहला देने वाली दास्तान है सेवानिवृत्त कर्नल (तत्कालीन मेजर) मोहन सिंह धुपालिया की, जिन्होंने महज 10 जवानों के साथ दुश्मन के इलाके में घुसकर वो कारनामा कर दिखाया, जिसने कारगिल युद्ध (Kargil War 1999) का रुख ही बदल दिया।

जब खाली चौकियों का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने पीठ में घोंपा छुरा

कारगिल युद्ध की खौफनाक पटकथा 1998-99 की सर्दियों में लिखी गई थी। कर्नल मोहन सिंह धुपालिया बताते हैं कि उस वक्त एक पुराना सैन्य प्रोटोकॉल था—नवंबर और दिसंबर में जब -30 से -40 डिग्री तापमान और भारी बर्फबारी होती थी, तो भारतीय और पाकिस्तानी दोनों सेनाएं अपनी बेहद ऊंची चौकियों को खाली करके नीचे आ जाती थीं। मौसम ठीक होने पर गर्मियों में सैनिक वापस लौटते थे।

लेकिन 1999 की सर्दियों में पाकिस्तान ने नीचता की सारी हदें पार कर दीं।

  • 3-4 महीने की खामोश तैयारी: पाकिस्तानी सेना की नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री और आतंकियों ने चुपके से खाली पड़ी भारतीय चौकियों पर कब्जा जमा लिया।

  • 100 से ज्यादा चोटियों पर कब्जा: करीब 160 किलोमीटर लंबे इलाके में फैली 100 से अधिक सामरिक चोटियों पर दुश्मन गोला-बारूद, हथियार और महीनों का राशन जमा करके बैठ गया।

  • कैप्टन सौरभ कालिया की शहादत से खुला राज: शुरुआत में लगा कि यह कुछ घुसपैठियों की छोटी-मोटे हरकत है। लेकिन जब कैप्टन सौरभ कालिया और उनके गश्ती दल के जवानों पर हमला हुआ और उनके साथ बर्बरता की गई, तब भारतीय सेना को समझ आया कि यह कोई आम घुसपैठ नहीं, बल्कि पाकिस्तान का एक बड़ा और खतरनाक सैन्य षड्यंत्र है।

18 हजार फीट पर युद्ध: जहां एक सिपाही भारी पड़ता था सैकड़ों पर

पहाड़ों पर युद्ध का एक कड़वा सच होता है—ऊंचाई पर बैठा दुश्मन हमेशा हावी रहता है। कर्नल धुपालिया याद करते हैं कि 16 से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर न तो कोई पेड़-पौधा था और न ही छिपने की जगह। खड़ी, नंगी चट्टानों पर चढ़कर हमला करना सीधा मौत को दावत देना था। अगर दुश्मन का एक सिपाही भी ऊपर मशीन गन लेकर बैठा हो, तो वह नीचे से आ रहे सैकड़ों सैनिकों को रोक सकता था। लेकिन भारतीय सेना ने हार नहीं मानी। रणनीति बदली गई—दुश्मन की मुख्य सप्लाई लाइन (राशन और गोला-बारूद की आपूर्ति) को काटना ही सबसे बड़ा हथियार बना।

10 जवान और कर्नल धुपालिया का 'मिशन इम्पॉसिबल'

इसी दौरान तत्कालीन मेजर मोहन सिंह धुपालिया को एक ऐसा काम सौंपा गया जो किसी आत्मघाती मिशन से कम नहीं था। उन्हें और उनकी 10 जवानों की छोटी सी टुकड़ी को मुख्य मोर्चे से अलग, दुश्मन के कब्जे वाले इलाके के बेहद अंदर घुसने का आदेश मिला।

  • दुश्मन के इलाके में सीक्रेट एंट्री: कर्नल धुपालिया और उनके 10 जांबाज बर्फ के बीच रेंगते हुए, दुश्मन की नजरों से बचकर उनके इलाके में दाखिल हुए।

  • सप्लाई लाइन पर प्रहार: टीम ने बहादुरी का परिचय देते हुए दुश्मन की रसद और गोलियों की सप्लाई लाइन को पूरी तरह से काट दिया।

  • आमने-सामने की मुठभेड़: इस खतरनाक सीक्रेट ऑपरेशन के दौरान कर्नल धुपालिया की टीम का सामना पाकिस्तानी सैनिकों से हुआ। बिना डरे भारतीय जांबाजों ने हमला बोलकर एक जेसीओ (JCO) समेत 4 पाकिस्तानी सैनिकों को मौके पर ही ढेर कर दिया।

दुश्मन की रसद कटते ही ऊपर चोटियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक अलग-थलग पड़ गए, जिससे भारतीय सेना को आगे बढ़ने और एक-एक करके चोटियों को मुक्त कराने का मौका मिल गया। इस अदम्य साहस और बेमिसाल नेतृत्व के लिए कर्नल मोहन सिंह धुपालिया को सेनाध्यक्ष कमेंडेशन कार्ड (COAS Commendation Card) से सम्मानित किया गया।

 क्या हम सच में निश्चिंत हैं?

कारगिल युद्ध में भारत ने करीब 527 वीर सपूतों को खोया और 26 जुलाई 1999 को तिरंगा लहराकर दुनिया को अपनी ताकत दिखाई। कर्नल धुपालिया कहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी को यह याद रखना जरूरी है कि यह आजादी और शांति मुफ्त में नहीं मिली है। लेकिन 27 साल बाद भी, जब बर्फानी हवाएं कारगिल की उन 18 हजार फीट ऊंची चोटियों पर बहती हैं, तो एक सन्नाटा सा छा जाता है...