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पाकिस्तान ने इजराइल को मान्यता देने से किया इनकार: रक्षा मंत्री बोले- ‘जिन पर एक दिन भरोसा नहीं, उनसे दोस्ती कैसे करें’

Kashish Sain 3 months ago
पाकिस्तान ने इजराइल को मान्यता देने और अब्राहम समझौते में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान अपनी मूल विचारधारा से समझौता नहीं करेगा।
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पाकिस्तान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने या उसे आधिकारिक मान्यता देने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि देश अपनी “मौलिक विचारधारा” से समझौता नहीं कर सकता।

उन्होंने तीखे शब्दों में कहा—

आसिफ के इस बयान ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान फिलहाल इजराइल के साथ संबंध सुधारने की दिशा में कोई कदम उठाने को तैयार नहीं है।

ट्रम्प चाहते हैं मुस्लिम देश इजराइल से रिश्ते सुधारें

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने की अपील कर रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान से भी कहा गया था कि अगर वह अमेरिका-ईरान शांति प्रक्रिया में बड़ी भूमिका चाहता है, तो उसे इजराइल को मान्यता देने पर विचार करना होगा।

ट्रम्प की रणनीति पश्चिम एशिया में एक नया अमेरिकी समर्थक गठबंधन तैयार करने की मानी जा रही है, जिसमें इजराइल और प्रमुख मुस्लिम देश एक साथ हों।

क्या है अब्राहम समझौता?

अब्राहम समझौता (Abraham Accords) ट्रम्प प्रशासन की बड़ी कूटनीतिक पहल थी।

मकसद

  • इजराइल और अरब/मुस्लिम देशों के बीच रिश्ते सामान्य करना
  • व्यापार, तकनीक, रक्षा और पर्यटन में सहयोग बढ़ाना
  • पश्चिम एशिया में स्थिरता और रणनीतिक साझेदारी बनाना

शुरुआत

  • घोषणा: 13 अगस्त 2020
  • औपचारिक शुरुआत: 15 सितंबर 2020

अब तक शामिल देश

  • UAE
  • बहरीन
  • मोरक्को
  • सूडान (प्रक्रिया जारी)
  • कजाकिस्तान

इन देशों ने इजराइल के साथ आधिकारिक रिश्ते स्थापित किए।

पाकिस्तान के लिए यह मुद्दा इतना संवेदनशील क्यों?

पाकिस्तान लंबे समय से खुद को फिलिस्तीन का मजबूत समर्थक बताता रहा है।

देश के भीतर फिलिस्तीन मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक और भावनात्मक विषय भी माना जाता है। यही वजह है कि इजराइल को मान्यता देने का सवाल पाकिस्तान की घरेलू राजनीति से सीधे जुड़ जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अमेरिका के साथ रिश्ते खराब नहीं करना चाहता, लेकिन वह घरेलू जनभावनाओं को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता।

78 साल से नहीं दी इजराइल को मान्यता

पाकिस्तान ने अपनी स्थापना के बाद से आज तक कभी इजराइल को आधिकारिक मान्यता नहीं दी।

उसका आधिकारिक रुख हमेशा यही रहा है—

इसी नीति की वजह से पाकिस्तान में कोई भी सरकार इजराइल पर नरम रुख अपनाने से बचती रही है।

गाजा युद्ध के बाद और बढ़ा विरोध

विशेषज्ञ मानते हैं कि गाजा युद्ध के बाद अरब और मुस्लिम देशों में इजराइल के खिलाफ गुस्सा काफी बढ़ा है।

सऊदी अरब जैसे देश, जो पहले इजराइल के साथ रिश्ते सुधारने के करीब माने जा रहे थे, अब ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं।

सऊदी अरब ने साफ कहा है कि—

  • फिलिस्तीनी राष्ट्र बनाने की दिशा में ठोस कदम जरूरी हैं
  • बिना इसके इजराइल से पूर्ण संबंध संभव नहीं

इजराइल फिलहाल इस मांग को स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहा।

ट्रम्प बोले- रिश्ते सुधारने से होगा फायदा

डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि अब्राहम समझौते से जुड़े देशों को आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर बड़ा फायदा मिला है।

उन्होंने कहा—

  • व्यापार बढ़ा
  • निवेश आया
  • सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ
  • पश्चिम एशिया में स्थिरता बढ़ी

ट्रम्प ने इसे “दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समझौता” बताया।

इमरान खान ने भी किया था विरोध

यह पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान ने इजराइल से दूरी बनाई हो।

ट्रम्प के पहले कार्यकाल में भी पाकिस्तान पर अब्राहम समझौते में शामिल होने का दबाव बताया गया था। उस समय प्रधानमंत्री इमरान खान ने साफ इनकार कर दिया था।

इमरान खान ने कहा था—

बाद में सत्ता से हटने के बाद उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी सरकार पर अमेरिका और कुछ “मित्र देशों” की ओर से दबाव बनाया गया था।

जिन्ना का जिक्र क्यों हो रहा?

पाकिस्तान में यह धारणा भी काफी मजबूत है कि इजराइल को मान्यता देना देश की स्थापना के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इजराइल के गठन का विरोध किया था। उन्होंने इसे “अरब दुनिया के दिल में घोंपा गया खंजर” बताया था।

यही वजह है कि पाकिस्तान में फिलिस्तीन समर्थन को केवल विदेश नीति नहीं, बल्कि वैचारिक मुद्दा भी माना जाता है।

कश्मीर और फिलिस्तीन को साथ जोड़ता रहा है पाकिस्तान

विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर और फिलिस्तीन मुद्दों को एक-दूसरे से जोड़कर पेश करता रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान—

  • कश्मीर पर भारत की आलोचना करता है
  • फिलिस्तीन का समर्थन करता है
  • दोनों मुद्दों को “आत्मनिर्णय” से जोड़ता है

ऐसे में अगर पाकिस्तान फिलिस्तीन पर अपना रुख नरम करता है, तो कश्मीर पर उसका नैरेटिव भी कमजोर पड़ सकता है।

क्या भविष्य में बदल सकता है पाकिस्तान का रुख?

फिलहाल पाकिस्तान का रुख पूरी तरह स्पष्ट नजर आता है।

लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि पश्चिम एशिया की राजनीति तेजी से बदल रही है। अमेरिका, इजराइल और खाड़ी देशों के बीच नई रणनीतिक साझेदारियां बन रही हैं।

ऐसे में आने वाले वर्षों में पाकिस्तान पर दबाव और बढ़ सकता है। हालांकि मौजूदा हालात, गाजा युद्ध और घरेलू राजनीति को देखते हुए पाकिस्तान के लिए अब्राहम समझौते में शामिल होना फिलहाल बेहद मुश्किल माना जा रहा है।

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