स्वतंत्रता दिवस विशेष: ब्रिटिश हुकूमत को घुटनों पर लाने वाले जननायक 'टंट्या मामा'
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जब भी आदिवासी विद्रोह और अदम्य साहस की बात आती है, जननायक टंट्या भील (जिन्हें लोग प्यार से 'टंट्या मामा' कहते हैं) का नाम सबसे आगे आता है। अंग्रेजी हुकूमत के लिए वे एक चुनौती थे, जबकि भारतीय जनमानस के लिए वे गरीबों के मसीहा और 'इंडियन रॉबिनहुड' थे।
जन्म और प्रारंभिक जीवन: टंट्या भील का जन्म 25 जनवरी 1840 को तत्कालीन नागपुर साम्राज्य के निमाड़ जिले (वर्तमान मध्य प्रदेश) के पंधाना गांव में एक आदिवासी भील परिवार में हुआ था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों द्वारा आदिवासियों और आम जनता पर किए जा रहे जुल्मों ने उनके मन में बगावत की चिंगारी सुलगा दी।
अमीरों और अंग्रेजों को लूटकर गरीबों में बांटा: टंट्या भील ने ब्रिटिश सरकार के खजानों और उनके चाटुकारों की संपत्ति को निशाना बनाया और लूटी गई दौलत को गरीब, असहाय और जरूरतमंद आदिवासियों में बांट दिया। वे हर आयु वर्ग के लोगों के बीच 'मामा' के नाम से लोकप्रिय हुए। आज भी भील समाज खुद को 'मामा' कहलाने में गर्व महसूस करता है।
गुरिल्ला युद्ध और निशानेबाजी के उस्ताद: टंट्या भील पारंपरिक तीरंदाजी, बंदूक चलाने और गुरिल्ला (छापामार) युद्धकला में बेहद निपुण थे। उनका मुख्य हथियार 'दावा' (फलिया) था। वे जंगलों, घाटियों और बीहड़ों में रहकर करीब 12 वर्षों (1878 से 1889) तक अंग्रेजों और होलकर सेना से लोहा लेते रहे। वे कई बार जेल तोड़कर फरार हुए और अंग्रेजों की भारी-भरकम पुलिस फोर्स को छकाते रहे।
न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी गिरफ्तारी की खबर: टंट्या भील का प्रभाव इस कदर था कि 10 नवंबर 1889 को अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने उनकी गिरफ्तारी की खबर को प्रमुखता से छापा और उन्हें "भारत का रॉबिनहुड" (Robin Hood of India) करार दिया।
धोखे से गिरफ्तारी और शहादत: अंग्रेज सीधे तौर पर टंट्या भील को कभी नहीं पकड़ सके। अंततः उनके एक मुंहबोले रिश्तेदार गणपत के धोखे की वजह से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पहले इंदौर और फिर कड़ी सुरक्षा में जबलपुर जेल ले जाया गया, जहां ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें अमानवीय यातनाएं दीं। 19 अक्टूबर 1889 को सेशन कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई और 4 दिसंबर 1889 को उन्हें फांसी दे दी गई।
पातालपानी में आज भी रुकती है ट्रेन: अंग्रेज आदिवासियों के भारी विद्रोह से डरे हुए थे, इसलिए फांसी के बाद उनका शव इंदौर-खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी के जंगलों में फेंक दिया गया। उस स्थान पर आज टंट्या मामा का समाधि स्थल बना हुआ है। परंपरा और सम्मान के तौर पर आज भी इस रूट से गुजरने वाली हर ट्रेन कुछ पलों के लिए टंट्या मामा की समाधि के सामने रुकती है।
12 साल तक अंग्रेजों की नाक में दम करने वाले इस महान जननायक का बलिदान आजादी के इतिहास में सदैव अमर रहेगा। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वीर क्रांतिकारी टंट्या भील को शत्-शत् नमन।