स्वतंत्रता दिवस विशेष: स्वदेशी के लिए सीना तानने वाले हुतात्मा बाबू गेनू सैद

भारत की आजादी का इतिहास केवल बड़े नेताओं के भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन गुमनाम और आम वीरों के लहू से भी लिखा गया है जिन्होंने देश के लिए हंसते-हंसते अपनी जान न्योछावर कर दी। ऐसे ही एक वीर क्रांतिकारी थे हुतात्मा बाबू गेनू सैद, जिन्होंने महज 22 वर्ष की उम्र में स्वदेशी आंदोलन के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया था।

किसान परिवार में जन्म और मुंबई की मिल में मजदूरी: बाबू गेनू सैद का जन्म 1 जनवरी 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के आंबेगांव तालुका स्थित महालुंगे पड़वल गांव के एक बेहद गरीब किसान परिवार में हुआ था। आजीविका की तलाश में वे मुंबई आ गए और यहां एक कॉटन (सूती) मिल में मजदूर के रूप में काम करने लगे।

स्वदेशी आंदोलन और विदेशी कपड़ों का विरोध: उस दौर में महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश भर में आजादी का आंदोलन और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार (स्वदेशी आंदोलन) का अभियान चरम पर था। बाबू गेनू भी इस आंदोलन में पूरी निष्ठा के साथ कूद पड़े। वे विदेशी कपड़ों के आयात और बिक्री के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे।

12 दिसंबर 1930 का वह ऐतिहासिक बलिदान: 12 दिसंबर 1930 को मैनचेस्टर के एक अंग्रेज कपड़ा व्यापारी जॉर्ज फ्रैजियर ने मुंबई के फोर्ट इलाके की पुरानी हनुमान गली स्थित अपनी दुकान से विदेशी कपड़ों से भरा एक ट्रक मुंबई बंदरगाह की ओर रवाना किया। आंदोलनकारियों के डर से उसने ब्रिटिश पुलिस से सुरक्षा मांगी थी।

जब प्रदर्शनकारियों ने ट्रक को रोकने की कोशिश की, तो पुलिस ने बल प्रयोग कर उन्हें पीछे धकेल दिया। लेकिन जैसे ही ट्रक कालबादेवी रोड पर भांगवाड़ी के पास पहुंचा, 22 वर्षीय बाबू गेनू महात्मा गांधी के जयकारे लगाते हुए निडर होकर सीधे ट्रक के आगे खड़े हो गए।

'वह मेरा भाई है, मैं उसका कत्ल नहीं कर सकता': अंग्रेज पुलिस अधिकारी ने ट्रक ड्राइवर को सीधे बाबू गेनू के ऊपर गाड़ी चढ़ाने का आदेश दिया। लेकिन उस भारतीय ड्राइवर का जमीर जाग उठा। उसने आदेश मानने से साफ इनकार करते हुए कहा— "मैं भी भारतीय हूं और वह भी भारतीय है। हम दोनों आपस में भाई हैं, फिर मैं अपने ही भाई का कत्ल कैसे कर सकता हूं?"

इसके बाद बौखलाए अंग्रेज पुलिस अधिकारी ने खुद ड्राइविंग सीट संभाली और ट्रक को बाबू गेनू के ऊपर चढ़ा दिया। विदेशी कपड़ों से लदे भारी ट्रक के पहियों के नीचे कुचलकर बाबू गेनू ने मौके पर ही देश के लिए शहादत दे दी।

मुंबई में भड़की आंदोलन की ज्वाला: बाबू गेनू की इस निर्मम शहादत की खबर फैलते ही पूरी मुंबई में भारी रोष फैल गया। जगह-जगह जोरदार प्रदर्शन, हड़तालें और आंदोलन शुरू हो गए। उनकी इस शहादत ने स्वदेशी आंदोलन में नई जान फूंक दी और ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी।

अमर पहचान और स्मारक: देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर को 'हुतात्मा बाबू गेनू' के नाम से जाना गया। आज भी उनकी स्मृति में कई प्रमुख स्थलों के नाम रखे गए हैं:

  • नवी मुंबई में बाबू गेनू ग्राउंड

  • पुणे में बाबू गेनू चौक और प्रसिद्ध 'हुतात्मा बाबू गेनू गणपति'

  • दक्षिण दिल्ली में 'अमर शहीद बाबू गेनू मार्ग'

  • मुंबई के परेल स्थित केईएम अस्पताल के पास उनकी प्रतिमा और स्मारक

  • उनके पैतृक गांव महालुंगे पड़वल में बाबू गेनू वाड़ी

22 साल के इस नौजवान का बलिदान हमें याद दिलाता है कि आजादी की कीमत कितनी भारी थी। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर हुतात्मा बाबू गेनू सैद को कोटि-कोटि नमन।