जयपुर :राजस्थान की राजनीति में अगर 'कांग्रेस' और 'अंदरूनी खींचतान' की बात न हो, तो लगता है खबर अधूरी है। अमूमन जब भी पार्टी में कलह की बात आती थी, तो चेहरा गहलोत और पायलट का होता था। मगर इस बार सियासी बाज़ार में नई जोड़ी की चर्चा है—अशोक गहलोत बनाम गोविंद सिंह डोटासरा! मामला एक मुलाकात से शुरू हुआ और देखते ही देखते कांग्रेस के अंदरूनी बवंडर में बदल गया। लेकिन जब प्रदेश अध्यक्ष का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचा, तो पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को खुद सफाई देने मैदान में उतरना पड़ा।

नारेबाज़ी पड़ी भारी, डोटासरा ने लगा दी क्लास

पूरी कहानी की शुरुआत हुई बांसवाड़ा-वागड़ के दिग्गज नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय की एक जयपुर यात्रा से। मालवीय अपने साथ सैकड़ों समर्थकों को लेकर जयपुर पहुंचे थे। यह काफिला सबसे पहले अशोक गहलोत के पास पहुंचा। वहां माहौल ऐसा बना कि समर्थकों ने खुलकर नारेबाज़ी शुरू कर दी— "अशोक गहलोत चौथी बार!" इसके बाद जब यही भीड़ प्रदेश कांग्रेस दफ़्तर पहुंची और गोविंद सिंह डोटासरा के सामने खड़ी हुई, तो डोटासरा का पारा चढ़ गया। उन्होंने मालवीय के सामने ही खरी-खोटी सुनाते हुए कहा कि "जो लोग पार्टी से ऊपर अपनी खुद की ब्रांडिंग करते हैं, उसी व्यक्तिवाद ने पहले कांग्रेस का नुकसान किया है।" डोटासरा का यह बयान आते ही सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया।

गहलोत बोले— 'मैं तो आने को मना कर रहा था...'

जब विवाद बढ़ा और मीडिया ने सवाल दागे, तो अशोक गहलोत ने माहौल को ठंडा करने की कोशिश की। उन्होंने बेहद सधे हुए अंदाज में कहा कि वे कार्यकर्ताओं को लगातार जयपुर आने से रोक रहे थे। गहलोत ने कहा, "मैं तो खुद कह रहा था कि 500 किलोमीटर की बस यात्रा करके जयपुर मत आओ, मैं खुद बांसवाड़ा आकर मिल लूंगा। लेकिन कार्यकर्ता जिद पर अड़े थे।" उन्होंने यह भी साफ किया कि वहां कोई पार्टी जॉइनिंग नहीं हो रही थी, कार्यकर्ता बस मिलने आए थे और उन्होंने डोटासरा जी से भी मिलने का वक्त लिया था।

निष्कर्ष और उठते सवाल

अशोक गहलोत ने कैमरे के सामने यह कहकर बात संभालने की कोशिश की कि "ना डोटासरा जी नाराज हैं, ना मैं... हम सब एकजुट हैं।" उन्होंने उल्टा सारा ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ दिया कि आप लोग ऐसे सवाल पूछोगे तो कोई भी भड़क जाएगा। लेकिन राजनीति को गहराई से समझने वाले जानते हैं कि धुंआ वहीं उठता है जहां आग लगी होती है। क्या डोटासरा की यह नाराजगी सिर्फ एक बयान भर है, या फिर राजस्थान कांग्रेस में वर्चस्व की कोई नई लड़ाई जन्म ले चुकी है? क्या 'गहलोत चौथी बार' के नारे पार्टी के बाकी गुटों को चुभने लगे हैं? और सबसे बड़ा सवाल— क्या यह बयानबाजी आने वाले चुनावों में पार्टी का खेल बिगाड़ेगी? पर्दे के पीछे की यह सियासी जंग क्या मोड़ लेती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।