बिहार के नवादा जिले के छोटे से कस्बे वरीसालीगंज के लिए NEET UG 2026 का रिजल्ट किसी त्योहार से कम नहीं रहा। यहां के 18 वर्षीय आयुष भालोटिया ने 720 में से 710 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक (AIR) 4 प्राप्त की है। आयुष की इस शानदार उपलब्धि ने न सिर्फ उनके परिवार बल्कि पूरे इलाके को गर्व से भर दिया है।

परिवार का दावा है कि आयुष अपने गांव के पहले डॉक्टर बनने जा रहे हैं। यही वजह है कि रिजल्ट घोषित होने के बाद से घर पर लगातार लोगों का आना-जाना लगा हुआ है। रिश्तेदार, पड़ोसी और गांव के लोग मिठाइयां बांटकर इस सफलता का जश्न मना रहे हैं।

आयुष बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना देखते थे। उनके लिए यह केवल एक करियर नहीं, बल्कि समाज की सेवा करने का माध्यम था। उन्होंने शुरू से ही पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया और लगातार मेहनत करते रहे।

पढ़ाई में भी आयुष हमेशा अव्वल रहे। उन्होंने 10वीं बोर्ड परीक्षा में 96.2 प्रतिशत और 12वीं बोर्ड परीक्षा में 93.8 प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद उन्होंने पूरी तरह NEET की तैयारी पर फोकस किया।

आयुष के अनुसार उनकी सफलता का सबसे बड़ा राज डेली रिवीजन और नियमित मॉक टेस्ट रहे। वे हर टेस्ट के बाद अपनी गलतियों का विश्लेषण करते थे और उन्हें दोबारा न दोहराने पर विशेष ध्यान देते थे।

वे बताते हैं कि NEET की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए NCERT की किताबों पर मजबूत पकड़ बेहद जरूरी है। बार-बार किताबें बदलने के बजाय एक ही किताब को अच्छी तरह समझना और लगातार अभ्यास करना सफलता की असली कुंजी है।

आयुष पिछले दो वर्षों से एलन करियर इंस्टीट्यूट के नियमित क्लासरूम छात्र रहे। क्लास के बाद वे रोजाना 7 से 8 घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। उनका मानना है कि पढ़ाई के घंटों से ज्यादा उसकी गुणवत्ता मायने रखती है।

तैयारी के दौरान मानसिक दबाव भी आया, लेकिन परिवार और शिक्षकों ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। आयुष अपनी सफलता का श्रेय अपने बड़े भाई अर्पित भालोटिया को भी देते हैं, जो IIT दिल्ली से पढ़ाई कर चुके हैं और फिलहाल अमेरिका में पीएचडी कर रहे हैं। उन्होंने आयुष को टाइम मैनेजमेंट, अनुशासन और मानसिक संतुलन बनाए रखने के कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

आयुष के पिता सुनील कुमार भालोटिया सीमेंट और स्टील के कारोबारी हैं, जबकि उनकी मां किरण देवी ने हर कदम पर उनका मनोबल बढ़ाया। आयुष का कहना है कि यह सफलता पूरे परिवार की मेहनत और विश्वास का परिणाम है।

लगातार पढ़ाई के बीच तनाव दूर करने के लिए आयुष शतरंज खेलना पसंद करते थे। उनका मानना है कि हर छात्र के पास पढ़ाई के साथ कोई न कोई हॉबी जरूर होनी चाहिए, जिससे दिमाग तरोताजा रहता है और पढ़ाई में एकाग्रता बनी रहती है।

आयुष की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदारी से की जाए और सही मार्गदर्शन मिले तो छोटे गांव और कस्बों से भी देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में शानदार सफलता हासिल की जा सकती है। आज उनकी कहानी लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।