भरतपुर: परिंदों का वो विश्वप्रसिद्ध ठिकाना, जहाँ हर साल हजारों मील का सफर तय करके प्रवासी पक्षी सुकून की तलाश में आते हैं... आज खुद तड़प रहा है। केवलादेव नेशनल पार्क (घना) इस वक्त अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है। जिस पानी की बदौलत यह जगह गुलजार रहती थी, आज वही पानी यहाँ के बाशिंदों की सबसे बड़ी जंग बन चुका है।

तड़पकर खत्म हो रही हैं मछलियां

पार्क के सूखे पड़े तालाबों में स्थिति अब डरावनी होने लगी है। पानी का जलस्तर बेहद कम हो जाने की वजह से पानी में ऑक्सीजन खत्म हो चुकी है। इसका नतीजा यह हुआ कि सैकड़ों मछलियां रोजाना दम तोड़ रही हैं। बेजुबान जलजीवों को बचाने के लिए पार्क की टीमें उन्हें बाल्टियों और टैंकरों के सहारे एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक में ले जाने को मजबूर हैं, लेकिन यह कोशिशें भी नाकाफी साबित हो रही हैं। मछलियां सिर्फ पानी की रानी नहीं हैं, बल्कि यहाँ आने वाले पक्षियों का मुख्य भोजन भी हैं। अब जब भोजन ही खत्म हो रहा है, तो पूरे पार्क की खाद्य-श्रृंखला और जैव विविधता बुरी तरह हिल गई है।

पांचना की 'तालाबंदी' और चंबल की नाकाफी बूँदें

केवलादेव को जिंदा रखने के लिए मानसून की शुरुआत तक करीब 550 एमसीएफटी पानी की दरकार होती है, जो मुख्य रूप से पांचना बांध से आता है। यह पानी सिर्फ प्यास नहीं बुझाता, बल्कि अपने साथ कई प्रजातियों की मछलियां और वनस्पतियां लेकर आता है जो घना की जान हैं। लेकिन इस बार पांचना से पानी का एक कतरा भी नसीब नहीं हुआ है। वैकल्पिक तौर पर चंबल परियोजना से जो पानी मिल रहा है, वह बेहद मामूली है—मानो जलती हुई जमीन पर सिर्फ दो बूँदें छिड़क दी गई हों।

सूने पड़े रास्ते, रोजी-रोटी के लिए तरसते हाथ

इस कुदरती त्रासदी ने इंसानों की जिंदगी पर भी ब्रेक लगा दिया है। विदेशी और देसी पर्यटकों का आना न के बराबर हो गया है। नतीजा यह है कि पार्क के बाहर खड़े रहने वाले सैकड़ों नेचर गाइड, रिक्शा चालक और छोटे दुकानदार अब हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। पर्यटन ठप होने से सैकड़ों परिवारों के चूल्हे ठंडे पड़ने की नौबत आ गई है।

क्या परिंदों को फिर भाएगा भरतपुर, या इस बार मोड़ लेंगे अपना मुंह?

पार्क प्रशासन से लेकर स्थानीय लोग और पर्यावरण प्रेमी हर तरफ से गुहार लगा रहे हैं। सरकार को आपात चिट्ठियां भेजी जा चुकी हैं और भरतपुर की सड़कों पर पानी की मांग को लेकर आवाजें उठने लगी हैं। पर असली सस्पेंस यही है—क्या फैसला लेने में इतनी देर हो जाएगी कि सब कुछ खत्म हो जाए? अगर वक्त रहते पांचना का पानी नहीं छोड़ा गया, तो क्या इस बार जब सात समंदर पार से साइबेरियन क्रेन और दुर्लभ पक्षी भरतपुर की सरजमीं पर कदम रखेंगे, तो उन्हें यहाँ सिर्फ सूखा और सन्नाटा मिलेगा? क्या भरतपुर का यह विश्व धरोहर का ताज हमेशा के लिए छिन जाएगा?

जवाब अब भी प्रशासनिक फाइलों के बीच अटका हुआ है, जबकि घना की घड़ियां तेजी से बंद होने की तरफ बढ़ रही हैं!