भरतपुर के नीले आसमान में छाएगा सन्नाटा? एक फैसले पर टिकी हजारों जिंदगियां!

भरतपुर का विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान इन दिनों गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। पांचना बांध से पानी की आपूर्ति न होने और चंबल परियोजना से पर्याप्त पानी न मिलने के कारण पार्क के जलाशय लगभग सूख चुके हैं। पानी में ऑक्सीजन की कमी से रोजाना सैकड़ों मछलियां दम तोड़ रही हैं, जिससे पक्षियों के मुख्य आहार पर संकट छा गया है। पर्यटकों की कमी के कारण स्थानीय गाइडों और रिक्शा चालकों की आजीविका भी प्रभावित हुई है, जिससे आगामी सर्दियों में दूर-दराज से आने वाले प्रवासी पक्षियों के आगमन पर गहरा प्रश्नचिह्न लग गया है।

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TEAM KHATAK Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Editor
July 30, 2026 • 1:25 PM  215
राजस्थान
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भरतपुर के नीले आसमान में छाएगा सन्नाटा? एक फैसले पर टिकी हजारों जिंदगियां!
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भरतपुर के नीले आसमान में छाएगा सन्नाटा? एक फैसले पर टिकी हजारों जिंदगियां!

भरतपुर: परिंदों का वो विश्वप्रसिद्ध ठिकाना, जहाँ हर साल हजारों मील का सफर तय करके प्रवासी पक्षी सुकून की तलाश में आते हैं... आज खुद तड़प रहा है। केवलादेव नेशनल पार्क (घना) इस वक्त अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है। जिस पानी की बदौलत यह जगह गुलजार रहती थी, आज वही पानी यहाँ के बाशिंदों की सबसे बड़ी जंग बन चुका है।

तड़पकर खत्म हो रही हैं मछलियां

पार्क के सूखे पड़े तालाबों में स्थिति अब डरावनी होने लगी है। पानी का जलस्तर बेहद कम हो जाने की वजह से पानी में ऑक्सीजन खत्म हो चुकी है। इसका नतीजा यह हुआ कि सैकड़ों मछलियां रोजाना दम तोड़ रही हैं। बेजुबान जलजीवों को बचाने के लिए पार्क की टीमें उन्हें बाल्टियों और टैंकरों के सहारे एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक में ले जाने को मजबूर हैं, लेकिन यह कोशिशें भी नाकाफी साबित हो रही हैं। मछलियां सिर्फ पानी की रानी नहीं हैं, बल्कि यहाँ आने वाले पक्षियों का मुख्य भोजन भी हैं। अब जब भोजन ही खत्म हो रहा है, तो पूरे पार्क की खाद्य-श्रृंखला और जैव विविधता बुरी तरह हिल गई है।

पांचना की 'तालाबंदी' और चंबल की नाकाफी बूँदें

केवलादेव को जिंदा रखने के लिए मानसून की शुरुआत तक करीब 550 एमसीएफटी पानी की दरकार होती है, जो मुख्य रूप से पांचना बांध से आता है। यह पानी सिर्फ प्यास नहीं बुझाता, बल्कि अपने साथ कई प्रजातियों की मछलियां और वनस्पतियां लेकर आता है जो घना की जान हैं। लेकिन इस बार पांचना से पानी का एक कतरा भी नसीब नहीं हुआ है। वैकल्पिक तौर पर चंबल परियोजना से जो पानी मिल रहा है, वह बेहद मामूली है—मानो जलती हुई जमीन पर सिर्फ दो बूँदें छिड़क दी गई हों।

TEAM KHATAK Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Editor

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