जयपुर। कभी-कभी एक खबर सिर्फ खबर नहीं होती, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक ऐसा सवाल होती है, जिसका जवाब हम सबको देना पड़ता है।
ज़रा एक पल के लिए सोचिए...
शायद उन्हें प्यास लगी होगी... लेकिन पानी देने वाला कोई नहीं था।
शायद वो गिर गए होंगे... लेकिन उठाने वाला कोई नहीं था।
शायद आखिरी सांसों में उन्होंने अपने बच्चों को पुकारा होगा... लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था।
और फिर... तीन दिन तक किसी को यह तक पता नहीं चला कि वो इस दुनिया से जा चुके हैं।
यह कहानी जयपुर के त्रिवेणी नगर स्थित एक अपार्टमेंट में रहने वाले 90 वर्षीय रिटायर्ड प्रिंसिपल हरिश्चंद्र की है। वह फ्लैट में अकेले रहते थे। आसपास के लोग उन्हें जानते थे, लेकिन पिछले कुछ दिनों से जब वह दिखाई नहीं दिए तो किसी ने खास ध्यान नहीं दिया।
फिर एक दिन फ्लैट से बदबू आने लगी।
पड़ोसियों को शक हुआ। उन्होंने पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और दरवाजे का ताला तोड़कर अंदर दाखिल हुई। कमरे के भीतर जो दृश्य था, उसने सभी को झकझोर दिया।
हरिश्चंद्र का शव कमरे में पड़ा था। शुरुआती जांच में पुलिस ने अनुमान लगाया कि उनकी मौत करीब तीन दिन पहले हो चुकी थी। उनके सिर पर चोट के निशान भी मिले हैं। मौत के कारणों की जांच की जा रही है।
परिवार था... लेकिन साथ नहीं था
सबसे दर्दनाक बात यह है कि हरिश्चंद्र अकेले नहीं थे, उनका परिवार था।
पुलिस के अनुसार उनका एक बेटा जयपुर में ही रहता है, जबकि दो बेटियां दिल्ली और बेंगलुरु में रहती हैं। बताया जा रहा है कि रिटायरमेंट के बाद संपत्ति को लेकर विवाद की आशंका भी सामने आई है। परिवार के सदस्य कभी-कभार मिलने आते थे, लेकिन पिछले कई दिनों से किसी ने उनसे संपर्क नहीं किया।
पुलिस ने परिजनों को सूचना दी, जिसके बाद वे मौके पर पहुंचे और अंतिम संस्कार किया गया।
सवाल सिर्फ एक मौत का नहीं है
यह मामला केवल एक बुजुर्ग की मौत का नहीं है। यह उस बदलते समाज का आईना भी है, जहां लोग एक ही शहर में रहते हैं, लेकिन रिश्तों के बीच की दूरी हजारों किलोमीटर जितनी हो चुकी है।
आज हम तकनीक से जुड़े हैं, लेकिन अपनों से दूर होते जा रहे हैं। वीडियो कॉल हैं, मैसेज हैं, सोशल मीडिया है... लेकिन क्या इतना काफी है?
कई बार माता-पिता को सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि एक दस्तक, एक फोन कॉल और थोड़े-से समय की जरूरत होती है।
समाज के लिए भी एक सवाल
अगर पड़ोसियों को बदबू नहीं आती, तो शायद यह भी पता नहीं चलता कि उस फ्लैट में कोई तीन दिन पहले दम तोड़ चुका है।
यह सवाल सिर्फ परिवार से नहीं, समाज से भी है। क्या हम अपने आसपास रहने वाले बुजुर्गों का हाल-चाल पूछने की जिम्मेदारी भी धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं?
सवाल यह नहीं है कि एक 90 साल के बुजुर्ग की मौत कैसे हुई।
सवाल यह है कि उन्हें अपनी जिंदगी के आखिरी तीन दिन अकेले क्यों बिताने पड़े?
जिस इंसान ने पूरी जिंदगी अपने परिवार के लिए मेहनत की, क्या उसकी आखिरी जरूरत सिर्फ एक इंसान का साथ भी नहीं थी?
याद रखिए... यहां सिर्फ एक बुजुर्ग की मौत नहीं हुई। यह घटना हमें बता रही है कि अगर रिश्तों से ज्यादा अहमियत संपत्ति, व्यस्तता, अहंकार और दूरी को मिलती रही, तो धीरे-धीरे हम सिर्फ अपने बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि अपने संस्कार, अपना समाज और अपनी संवेदनाएं भी खो देंगे।