गुरु' की वो कहानी जो दिल को छू जाती है, डॉ. राधाकृष्णन से सावित्रीबाई फुले तक की अनसुनी दास्तां

शिक्षक दिवस 1962 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर शुरू हुआ, जिन्होंने इसे शिक्षकों को समर्पित किया। सावित्रीबाई फुले, भारत की पहली महिला शिक्षिका, और राधाकृष्णन जैसे महान शिक्षाविदों की विरासत आज भी प्रेरणा देती है।

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Web Desk Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Sub Editor
September 5, 2025 • 11:11 AM  125
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गुरु' की वो कहानी जो दिल को छू जाती है, डॉ. राधाकृष्णन से सावित्रीबाई फुले तक की अनसुनी दास्तां
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गुरु' की वो कहानी जो दिल को छू जाती है, डॉ. राधाकृष्णन से सावित्रीबाई फुले तक की अनसुनी दास्तां

आज जब पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है, तो हमारी आंखों के सामने वो चेहरे घूम जाते हैं जिन्होंने हमें सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन का सबक सिखाया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये दिन कैसे शुरू हुआ? या भारत की पहली महिला शिक्षिका कौन थीं जिन्होंने समाज की दीवारें तोड़ीं? आइए, आज हम आपको ले चलते हैं शिक्षा की उन अनकही कहानियों में, जहां इतिहास और इंसानियत का मेल है। ये सिर्फ फैक्ट्स नहीं, बल्कि वो भावनाएं हैं जो हर शिक्षक के दिल में बसती हैं।

पहला शिक्षक दिवस: एक राष्ट्रपति का अनोखा फैसला जो इतिहास बन गया

कल्पना कीजिए, साल 1962। देश आजाद हुए अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता था। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जो उस वक्त भारत के राष्ट्रपति बने थे, का जन्मदिन था – 5 सितंबर। उनके छात्र और प्रशंसक बड़े धूमधाम से जश्न मनाना चाहते थे। लेकिन डॉ. राधाकृष्णन ने कहा, "मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय, इसे शिक्षकों को समर्पित कर दो।" बस, यहीं से भारत में शिक्षक दिवस की शुरुआत हुई। ये वो पल था जब एक व्यक्ति ने अपनी शान को छोड़कर, पूरे शिक्षक समुदाय को सम्मान दिया। आज 63 साल बाद भी ये दिन हमें याद दिलाता है कि शिक्षक सिर्फ क्लासरूम में नहीं, बल्कि समाज की नींव में हैं।

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