25 दिन से सुलग रही बगावत की आग,मंत्री के घर पहुंची संघर्ष समिति, क्या सरकार झुकेगी?
धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व को लेकर स्थानीय लोगों का विरोध 25वें दिन भी जारी है। संघर्ष समिति ने कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा के आवास पर पहुंचकर विस्थापन और रोजगार को लेकर अपनी मांगें रखीं।



राजस्थान के सरमथुरा उपखंड क्षेत्र में धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के खिलाफ स्थानीय लोगों का विरोध शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। आज 25वें दिन भी ग्रामीणों का धरना प्रदर्शन जारी रहा और इसे आसपास के इलाकों से भी भारी समर्थन मिल रहा है। आंदोलन पर बैठे लोगों का स्पष्ट कहना है कि वे वन्यजीवों और बाघों के संरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसके बदले में अपने घर, जमीन और रोजगार का बलिदान किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।
मंत्री किरोड़ीलाल मीणा के आवास पर हुई अहम चर्चा
अपनी आवाज को सरकार तक पहुंचाने के लिए धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व संघर्ष समिति का एक प्रतिनिधिमंडल कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा के जयपुर स्थित आवास पर पहुंचा। हालांकि, मंत्री महोदय की तबीयत खराब होने के चलते उनसे सीधी मुलाकात नहीं हो सकी। इसके बाद समिति के सदस्यों ने उनके भाई जगमोहन मीणा के साथ एक लंबी और विस्तृत बैठक की। इस दौरान ग्रामीणों की चिंताओं, धरने की स्थिति और टाइगर रिजर्व के कारण पैदा हुए संकट से उन्हें अवगत कराया गया।
'जानवर भी बचें और इंसान भी' - क्या हैं मुख्य मांगें?
आंदोलनकारियों का मुख्य नारा है कि संरक्षण ऐसा होना चाहिए जिसमें जानवर भी बचें और इंसान भी सुरक्षित रहें। सरमथुरा क्षेत्र मुख्य रूप से अपने 'लाल पत्थर' के काम के लिए जाना जाता है और हजारों परिवारों की रोजी-रोटी इसी पारंपरिक काम से जुड़ी है। ग्रामीणों की मांग है कि:
टाइगर रिजर्व की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले विस्थापन को लेकर सरकार अपनी नीति स्पष्ट करे।
स्थानीय लोगों के पारंपरिक रोजगार (लाल पत्थर का काम) को सुरक्षित रखा जाए।
प्रभावित परिवारों के भविष्य और आजीविका के लिए ठोस समाधान निकाला जाए।
सरकार से सकारात्मक पहल की जगी उम्मीद
जगमोहन मीणा के साथ हुई वार्ता में संघर्ष समिति को काफी सकारात्मक आश्वासन मिला है। ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीरता से सुना गया है, जिससे यह उम्मीद जगी है कि जल्द ही सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद का एक नया रास्ता खुलेगा।
पिछले 25 दिनों से ग्रामीण पूरी तरह से शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें उठा रहे हैं। उनका कहना है कि कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले प्रभावित जनता की बात जरूर सुनी जानी चाहिए। अब सभी की नजरें सरकार के अगले कदम और आगामी बातचीत पर टिकी हुई हैं।












































