त्रेतायुग: रावण ने इसे चांदी से निर्मित किया।
द्वापरयुग: भगवान श्रीकृष्ण ने लकड़ी का मंदिर बनवाया।
कलियुग: राजा भीमदेव सोलंकी ने इसे पत्थर से भव्य रूप दिया।
यह मंदिर कपिला, हिरण और सरस्वती नदियों के संगम (त्रिवेणी) पर स्थित होने के कारण प्राचीन काल से ही ऋषियों और भक्तों का केंद्र रहा है।
विदेशी आक्रांताओं के हमले और संघर्ष
अपनी अपार समृद्धि और धार्मिक महत्व के कारण सोमनाथ मंदिर आक्रांताओं की आँखों की किरकिरी बना रहा। इतिहास के अनुसार इस पर करीब 17 बार हमले हुए:
-
महमूद गजनवी (1024-26): गजनवी ने मंदिर को तहस-नहस किया और करोड़ों की संपत्ति लूटी। कहा जाता है कि इस दौरान 50 हजार भक्तों ने मंदिर की रक्षा में अपने प्राण त्याग दिए।
-
दिल्ली सल्तनत: अलाउद्दीन खिलजी (1299) और मुजफ्फर शाह (1394) ने भी मंदिर को भारी नुकसान पहुँचाया।
-
मुगल काल (औरंगजेब): 1665 से 1706 के बीच औरंगजेब ने मंदिर को पूरी तरह नष्ट करने की कोशिश की और यहाँ आने वाले भक्तों पर अत्याचार किए।
पुनरुद्धार की किरण: अहिल्याबाई होलकर का योगदान
18वीं सदी के अंत तक मंदिर क्षतिग्रस्त रहा। 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने देखा कि मुख्य मंदिर खंडहर हो चुका है, तो उन्होंने हमले की आशंका को देखते हुए पुराने स्थल से थोड़ी दूरी पर एक नया मंदिर बनवाया ताकि पूजा की परंपरा बनी रहे।
आजादी के बाद का संघर्ष: पटेल, मुंशी और नेहरू
सोमनाथ का आधुनिक इतिहास भारत के पुनरुत्थान की कहानी है:
-
सरदार पटेल का संकल्प: 13 नवंबर 1947 को जूनागढ़ के विलय के बाद सरदार पटेल ने खंडहर हो चुके मंदिर के पुनर्निर्माण की शपथ ली।
-
गांधी जी का सुझाव: महात्मा गांधी ने इस विचार का स्वागत किया लेकिन सुझाव दिया कि इसके लिए धन सरकार से नहीं बल्कि जनता के दान से आना चाहिए। इसी उद्देश्य के लिए सोमनाथ ट्रस्ट बना।
-
नेहरू-मुंशी विवाद: तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पुनर्निर्माण को 'हिंदू पुनर्जागरण' के रूप में देख रहे थे। उनका मानना था कि एक धर्मनिरपेक्ष सरकार को खुद को मंदिर निर्माण से नहीं जोड़ना चाहिए। केएम मुंशी ने इसे राष्ट्र के गौरव की वापसी बताया।
-
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का साहसिक कदम: 11 मई 1951 को जब प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उद्घाटन के लिए गए, तो नेहरू ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और व्यक्तिगत आस्था से पीछे नहीं हटेंगे।
वर्तमान स्वरूप
यद्यपि प्राण-प्रतिष्ठा 1951 में हुई, लेकिन मंदिर का पूर्ण निर्माण 1 दिसंबर 1995 को संपन्न हुआ, जब राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। आज यह मंदिर नागर शैली की कला का अद्भुत नमूना है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसके महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सोमनाथ इस बात का प्रतीक है कि "विनाशकारी शक्तियाँ और आतंक की सोच, कभी भी रचनात्मकता और श्रद्धा को स्थायी रूप से मिटा नहीं सकतीं।"