मेरठ 'ब्लू ड्रम' हत्याकांड: "अधर्म पर सजा देना धर्म...", पति के 5 टुकड़े करने वाली मुस्कान और प्रेमी साहिल को फांसी
मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत 'ब्लू ड्रम' हत्याकांड में कोर्ट ने पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी की सजा सुनाई है। जज ने कहा- 'अधर्म पर सजा देना धर्म है।'



उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुए दिल दहला देने वाले 'ब्लू ड्रम' हत्याकांड (Blue Drum Murder Case) में जिला एवं सत्र न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। पति सौरभ राजपूत की बेरहमी से हत्या करने वाली पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को कोर्ट ने फांसी की सजा (Death Penalty) सुनाई है। जज ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि 'अधर्म के काम पर सजा देना धर्म होता है।'
सजा का ऐलान होते ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट से जुड़े दोनों दोषी फूट-फूटकर रोने लगे। यह मेरठ के इतिहास में पहला मौका है, जब किसी महिला को फांसी की सजा सुनाई गई है।
"अधर्म पर सजा देना धर्म, कोई माफी नहीं"
मेरठ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा-II ने इस जघन्य हत्याकांड पर फैसला सुनाया। सजा सुनाते हुए जज ने सख्त लहजे में कहा-
"अधर्म के काम पर सजा देना धर्म होता है। मुस्कान-साहिल आप दोनों ने ही सौरभ की नृशंस हत्या की है। इसे छोड़ा नहीं जा सकता है। इसलिए माफी स्वीकार नहीं होगी और आप दोनों को मृत्युदंड दिया जाता है।"
जज ने जब मुस्कान से पूछा कि क्या वह कोई सजा चाहती है, तो उसने रोते हुए सिर्फ इतना कहा, "मेरी बच्चियों का ख्याल रखा जाए।" इसके बाद वह खामोश हो गई। वहीं, प्रेमी साहिल पूरे समय चुपचाप खड़ा रहा।
क्या था खौफनाक 'ब्लू ड्रम' हत्याकांड?
3 मार्च 2025 को सौरभ राजपूत की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। पत्नी मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया था। सबूत मिटाने के लिए दोनों ने सौरभ के शव के 5 टुकड़े किए और उसे एक नीले रंग के ड्रम में भरकर ऊपर से सीमेंट का घोल डाल दिया था। इस क्रूरता ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
इन 8 पुख्ता सबूतों ने पहुंचाया फांसी के फंदे तक
कोर्ट में अभियोजन पक्ष ने मजबूती से अपनी बात रखी। इन अहम सबूतों के आधार पर दोनों को फांसी हुई:
हत्या वाली रात साहिल को सौरभ के घर जाते देखने वाले चश्मदीद की गवाही।
मुस्कान और साहिल की निशानदेही पर कत्ल में इस्तेमाल चाकू और उस्तरा बरामद होना।
हत्या के हथियारों (आलाकत्ल) पर मानव रक्त (Human Blood) का मिलना।
साहिल-मुस्कान की कॉल डिटेल्स और सोशल मीडिया चैट्स।
सौरभ के दोस्त संजीव पाल की अहम गवाही और उसकी कॉल डिटेल।
सौरभ की मां रेनू की कॉल डिटेल।
जिन होटलों में मुस्कान और साहिल ठहरे, वहां के सीसीटीवी फुटेज और मैनेजर के बयान।
मामले में कुल 22 गवाहों की गवाहियां।
जेल में बदल जाएंगे नियम, 1975 के बाद मेरठ में होगी पहली फांसी
फांसी की सजा मुकर्रर होते ही चौधरी चरण सिंह जिला कारागार में दोनों दोषियों के लिए व्यवस्था बदल गई है।
बैरक और कपड़े बदले: वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा के मुताबिक, दोनों को 24 घंटे के भीतर विशेष बैरक में शिफ्ट किया जाएगा। अब तक सामान्य कपड़े पहनने वाली मुस्कान अब क्रीम कलर की साड़ी या सूट पहनेगी, जबकि साहिल को सफेद कुर्ता-पजामा पहनना होगा। जल्द ही दोनों को नया कैदी नंबर अलॉट होगा।
जेल का इतिहास: मेरठ जेल में आखिरी बार 1975 में मुजफ्फरनगर के करम सिंह को फांसी दी गई थी। अगर यह फांसी मुकम्मल होती है, तो साहिल यहां फांसी पाने वाला दूसरा पुरुष और मुस्कान पहली महिला होगी।
मां की आंखों में आए सुकून के आंसू, मुस्कान के परिजनों ने मोड़ा मुंह
सजा का ऐलान होने के बाद सौरभ की मां रो पड़ीं। उन्होंने भरे गले से कहा, "शांति से न्याय मिल गया।" सौरभ के भाई बबलू ने कहा कि उन्हें शुरू से ही फांसी की उम्मीद थी। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनका मुस्कान की बेटी से कोई वास्ता नहीं है और परिवार कोई डीएनए टेस्ट भी नहीं कराएगा।
दूसरी तरफ, मुस्कान के माता-पिता ने पुलिस के जरिए कोर्ट को एक पत्र सौंपा, जिसमें उन्होंने लिखा- "मुस्कान को चाहे जो सजा हो, हमें कोई मतलब नहीं। हम उससे कभी नहीं मिलेंगे, उसे फांसी होनी चाहिए।"
कोर्ट के बाहर वकीलों ने बांटे लड्डू, पुलिस टीम को मिलेगा इनाम
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद मेरठ कोर्ट के बाहर वकीलों ने एक-दूसरे को लड्डू खिलाकर खुशी जाहिर की। अधिवक्ता कृष्ण कुमार दुबे ने बताया कि कोर्ट ने धारा 302 के तहत 50 हजार रुपए और धारा 238A के तहत 20 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। वहीं, मेरठ एसएसपी बीबीजीटीएस मूर्ति ने घोषणा की है कि इस केस के खुलासे में बेहतरीन काम करने वाली पुलिस टीम को प्रशस्ति पत्र और नकद पुरस्कार दिया जाएगा।
आगे क्या होगी कानूनी प्रक्रिया?
डीजीसी (जिला शासकीय अधिवक्ता) केके चौबे ने बताया कि इस सजा को कंफर्म करने के लिए फाइल करीब एक सप्ताह बाद हाईकोर्ट भेजी जाएगी। हाईकोर्ट की मुहर के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा। वहां से सजा बरकरार रहने पर फाइल राष्ट्रपति के पास दया याचिका के लिए जाएगी। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद ही फांसी की तारीख तय होगी। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में 2 से 3 साल का समय लग सकता है।












































