सुप्रीम कोर्ट में सहमति से यौन संबंध की उम्र 18 से घटाकर 16 करने की मांग पर आज सुनवाई: केंद्र की सख्त दलीलें, कोर्ट ने कहा- विषय अत्यंत संवेदनशील

सुप्रीम कोर्ट में सहमति की उम्र 18 से 16 करने की याचिका पर सुनवाई; केंद्र ने कहा- प्रेम के नाम पर कानून कमजोर करना खतरनाक, पॉक्सो एक्ट प्रभावित होगा

Mohit Parihar
Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor
November 12, 2025 • 2:40 PM  4.1k
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सुप्रीम कोर्ट में सहमति से यौन संबंध की उम्र 18 से घटाकर 16 करने की मांग पर आज सुनवाई: केंद्र की सख्त दलीलें, कोर्ट ने कहा- विषय अत्यंत संवेदनशील
“सुप्रीम कोर्ट में सहमति से यौन संबंध की उम्र 18 से घटाकर 16 करने की मांग पर आज सुनवाई: केंद्र की सख्त दलीलें, कोर्ट ने कहा- विषय अत्यंत संवेदनशील”
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सुप्रीम कोर्ट में सहमति से यौन संबंध की उम्र 18 से घटाकर 16 करने की मांग पर आज सुनवाई: केंद्र की सख्त दलीलें, कोर्ट ने कहा- विषय अत्यंत संवेदनशील

नई दिल्ली (12 नवंबर 2025): भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आज एक अत्यंत संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दे पर सुनवाई हो रही है। याचिकाकर्ताओं ने सहमति से शारीरिक संबंध (यौन संबंध) बनाने की वैधानिक उम्र को वर्तमान 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने की मांग की है। यह मांग प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट, 2012 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के प्रावधानों को चुनौती देती है। केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है और चेतावनी दी है कि इससे बाल संरक्षण कानून कमजोर हो जाएगा, जिसका दुरुपयोग "प्रेम के नाम पर" शोषण के लिए हो सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि यह विषय बहुत संवेदनशील है और इसे टुकड़ों में सुनने के बजाय एकसाथ निरंतर सुनवाई की जाएगी। जस्टिस की बेंच ने याचिकाकर्ताओं और केंद्र दोनों पक्षों से विस्तृत दलीलें मांगी हैं। यह सुनवाई किशोरावस्था, सहमति, लिंग समानता और बाल अधिकारों जैसे जटिल मुद्दों को छूती है, जो समाज के विभिन्न वर्गों में बहस छेड़ चुकी है।

याचिका का आधार: किशोरों के बीच सहमति को अपराध न मानने की मांग याचिका सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह द्वारा दायर की गई है, जो महिला अधिकारों और लिंग न्याय पर लंबे समय से काम कर रही हैं। 24 सितंबर 2025 को पेश की गई अपनी लिखित दलीलों में जयसिंह ने तर्क दिया है कि 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोर-किशोरियों के बीच आपसी सहमति से बने यौन संबंधों को POCSO एक्ट और IPC की धारा 375 के तहत अपराध की श्रेणी में रखना अन्यायपूर्ण और अप्रासंगिक है।उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार हैं:

सहमति की परिपक्वता: 16 वर्ष की आयु से किशोर मानसिक और शारीरिक रूप से ऐसे निर्णय लेने के लिए सक्षम होते हैं। वर्तमान कानून किशोरों के बीच प्राकृतिक और सहमति-आधारित संबंधों को भी अपराध मानकर उन्हें अपराधी बना देता है, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। 

लिंग भेदभाव: POCSO एक्ट लड़कियों की रक्षा के लिए डिजाइन किया गया है, लेकिन यह लड़कों को भी प्रभावित करता है। याचिका में कहा गया है कि कानून लिंग-तटस्थ होना चाहिए, क्योंकि सहमति दोनों पक्षों के बीच समान रूप से लागू होनी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय मानक: कई विकसित देशों (जैसे ब्रिटेन, कनाडा) में सहमति की उम्र 16 वर्ष है। भारत में इसे 18 रखना किशोरों की स्वायत्तता को नजरअंदाज करता है।

व्यावहारिक प्रभाव: वर्तमान प्रावधानों के कारण कई किशोर जोड़े झूठे मामलों में फंस जाते हैं, जहां परिवार या समाज के दबाव में शिकायतें दर्ज कराई जाती हैं। इससे किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है और वे न्यायिक प्रक्रिया के जाल में उलझ जाते हैं। ,जयसिंह ने कोर्ट से अपील की है कि POCSO एक्ट में संशोधन किया जाए ताकि 16-18 वर्ष के बीच सहमति-आधारित संबंध अपराध न माने जाएं। उन्होंने उदाहरण दिए हैं जहां किशोरों के बीच प्रेम संबंधों को "बलात्कार" या "यौन शोषण" का लेबल देकर सजा दी गई, जो न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

केंद्र सरकार का विरोध: "प्रेम के नाम पर उम्र कम करना खतरनाक, बाल सुरक्षा खतरे में" केंद्र सरकार ने इस याचिका का पुरजोर विरोध किया है। सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट में दलील दी है कि सहमति की उम्र घटाने से POCSO एक्ट का मूल उद्देश्य—बच्चों का यौन शोषण रोकना—कमजोर पड़ जाएगा। केंद्र की मुख्य चिंताएं इस प्रकार हैं:शोषण का खतरा: किशोरावस्था में बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। "प्रेम" या "सहमति" के नाम पर वयस्कों द्वारा शोषण आसान हो जाएगा। केंद्र ने तर्क दिया कि 16 वर्ष की उम्र में निर्णय लेने की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती, और दबाव या प्रलोभन में फंसना सामान्य है। 

कानूनी ढांचे की मजबूती: POCSO एक्ट 2012 में लागू होने के बाद से बाल यौन शोषण के मामलों में सजा दर बढ़ी है। उम्र घटाने से यह कानून "दांतहीन" हो जाएगा, और अपराधी बच निकलेंगे।

सामाजिक प्रभाव: भारत जैसे समाज में जहां बाल विवाह और लिंग असमानता अभी भी प्रचलित हैं, यह बदलाव लड़कियों के लिए अधिक खतरनाक साबित होगा। केंद्र ने आंकड़े पेश किए हैं कि 16-18 वर्ष की आयु में शोषण के 70% मामले "सहमति" के दावे के साथ दर्ज होते हैं, लेकिन जांच में शोषण सिद्ध होता है।

चेतावनी: सरकार ने कहा कि यह बदलाव "प्रेम के नाम पर अपराध" को वैध ठहरा सकता है, जिससे समाज में नैतिक पतन आएगा। इसके बजाय, शिक्षा और जागरूकता पर जोर दिया जाना चाहिए।केंद्र ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि याचिका खारिज की जाए और वर्तमान प्रावधानों को बरकरार रखा जाए।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया: निरंतर सुनवाई का निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा, "यह विषय बहुत संवेदनशील है। हम इसे टुकड़ों में नहीं, बल्कि एकसाथ निरंतर सुनेंगे।" बेंच ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में विशेषज्ञों—मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं—की राय भी ली जाए।कोर्ट ने यह भी नोट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लिंग भेदभाव निषेध) इस मामले से जुड़े हैं। हालांकि, बाल संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सुनवाई को कुछ हफ्तों के लिए स्थगित कर दिया गया है, ताकि पक्षकार अतिरिक्त सामग्री प्रस्तुत कर सकें।पृष्ठभूमि और व्यापक प्रभावयह याचिका 2023 से लंबित है, जब पहली बार इंदिरा जयसिंह ने इसे दायर किया था। तब से यह मामला सोशल मीडिया और मीडिया में बहस का विषय बना हुआ है। समर्थक इसे "किशोर अधिकारों" की जीत मानते हैं, जबकि विरोधी "बाल सुरक्षा" के खतरे की घंटी बजा रहे हैं।विशेषज्ञों का मत विभाजित है:समर्थक: चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट्स का कहना है कि कानून को आधुनिक बनाना जरूरी है, क्योंकि किशोर अब अधिक जागरूक हैं। 

विरोधी: UNICEF और अन्य संगठनों ने चेतावनी दी है कि भारत में बाल शादी के 27% मामले 15-19 वर्ष की लड़कियों से जुड़े हैं; उम्र घटाने से यह बढ़ सकता है।यह फैसला न केवल कानूनी, बल्कि सामाजिक परिवर्तन ला सकता है। यदि कोर्ट सहमत होता है, तो POCSO में संशोधन होगा; अन्यथा, वर्तमान कानून मजबूत रहेगा।

 

Mohit Parihar

Mohit Parihar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor

Mohit Parihar is a journalist at The Khatak, covering politics and public issues with a strong focus on ground reporting and factual storytelling.

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