वार्ड आरक्षण आते ही BJP में रार, पार्षद बनने की होड़ में उतरे 8 मंडल अध्यक्ष
उदयपुर नगर निगम चुनाव की आरक्षण लॉटरी जारी होते ही शहर भाजपा में टिकटों को लेकर घमासान मच गया है, जहाँ 12 में से 8 मंडल अध्यक्षों ने पार्षद पद के लिए खुद की या अपनी पत्नियों की दावेदारी जता दी है। अध्यक्षों की इस चुनावी महत्वाकांक्षा ने पार्टी नेतृत्व के सामने निष्ठावान कार्यकर्ताओं की नाराजगी, गुटबाजी और 'परिवारवाद' के आरोपों जैसी बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026Sub Editor
August 18, 2026 • 4:08 PM 1
र
राजनीति
NEWS CARD
“वार्ड आरक्षण आते ही BJP में रार, पार्षद बनने की होड़ में उतरे 8 मंडल अध्यक्ष”
Read more onthekhatak.com/s/12e018
18 Aug 2026
https://thekhatak.com/s/12e018
Copied
उदयपुर शहर में नगर निगम चुनावों (Udaipur Nagar Nigam Election) की सुगबुगाहट के साथ ही सियासी पारा चढ़ गया है। वार्डों की आरक्षण लॉटरी जारी होते ही शहर भाजपा (Udaipur BJP) में हलचल तेज हो गई है। संगठन के भीतर पार्षद पद का टिकट हासिल करने के लिए भारी अंदरूनी लॉबिंग और जोर-आजमाइश शुरू हो चुकी है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि उदयपुर शहर जिला भाजपा के कुल 12 मंडलों में से 8 मंडलों के अध्यक्ष सीधे तौर पर निकाय चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं। इनमें से कई खुद मैदान में उतरने को तैयार हैं, तो कुछ सीट आरक्षित होने पर अपनी पत्नियों को टिकट दिलाने की जुगत में लग गए हैं।
खुद चुनावी रण में उतरने को तैयार अध्यक्ष
कई मंडल अध्यक्ष ऐसे हैं जिनकी नजरें सीधे तौर पर पार्षद की कुर्सी पर टिकी हैं। ये पूरी तरह से चुनावी मैदान में उतरने का मानस बना चुके हैं:
रुचिका चौधरी: सुंदरसिंह भंडारी मंडल (10 वार्ड) की अध्यक्ष। यह वर्तमान में भी पार्षद हैं और वार्ड के अनारक्षित ओपन होने के बाद दोबारा मैदान में उतरने की तैयारी में हैं।
विजय आहूजा: श्यामा प्रसाद मुखर्जी मंडल (10 वार्ड) के अध्यक्ष, जो खुद को दौड़ में सबसे आगे मान रहे हैं।
प्रताप सिंह: देबारी मंडल (3 वार्ड) के अध्यक्ष। यहां का वार्ड नंबर 80 अनारक्षित (ओपन) होने से ये सीधे तौर पर प्रबल दावेदार बन गए हैं।
पत्नियों के जरिए चुनाव लड़ने की जुगत
कुछ वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हो गए हैं, जिसके चलते अध्यक्षों ने अपने परिवार के जरिए निगम में एंट्री की रणनीति बनाई है:
अमृत मेनारिया: सरदार पटेल मंडल (10 वार्ड) के अध्यक्ष खुद प्रबल दावेदार हैं, लेकिन अब उनकी पत्नी भी चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी में हैं।
मुकेश जोशी: भानु कुमार शास्त्री मंडल (5 वार्ड) के अध्यक्ष खुद चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन वार्ड 76 अनारक्षित महिला श्रेणी में आने के कारण वे अब अपनी पत्नी को मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं।
वहीं, झामेश्वर मंडल (5 वार्ड) के अध्यक्ष कमलेश शर्मा के स्थानीय क्षेत्र में अनारक्षित सीट नहीं आने के कारण वे चाहकर भी खुद चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं।
शहरी चुनाव छोड़ पंचायती राज में इनकी दिलचस्पी
ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े तीन मंडल अध्यक्ष ऐसे भी हैं, जिनका ध्यान नगर निगम के बजाय पंचायती राज (Panchayati Raj Elections) पर केंद्रित है:
मोहनलाल गमेती: जावर माता मंडल पूरी तरह से निगम सीमा से बाहर है, इसलिए अध्यक्ष पंचायती राज चुनाव में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं।
मोहन डांगी: बड़गांव मंडल में निगम का सिर्फ 1 वार्ड (वार्ड नंबर 1) आता है। डांगी वर्तमान में खुद लखावली के सरपंच हैं, इसलिए उनका पूरा फोकस ग्रामीण राजनीति पर है।
सुनील चौधरी: नांदेश्वर मंडल (2 वार्ड) के अध्यक्ष नाई गांव के निवासी हैं और उनकी रुचि भी शहरी निकाय के बजाय पंचायत चुनावों में ही है।
भाजपा नेतृत्व के सामने खड़ी हुईं 3 बड़ी चुनौतियां
वार्डों की लॉटरी के बाद उपजी इस स्थिति ने भाजपा संगठन और चुनाव प्रभारियों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है:
कार्यकर्ताओं में असंतोष: जब संगठन की कमान संभालने वाले मंडल अध्यक्ष ही टिकट की दौड़ में सबसे आगे रहेंगे, तो वार्ड स्तर पर सालों से दरी बिछाने वाले और मेहनत करने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष पनप सकता है।
'परिवारवाद' के आरोप: महिला आरक्षित सीटों पर अपनी पत्नियों या परिवार के सदस्यों को आगे करने से पार्टी को विपक्ष के साथ-साथ अपनों से भी 'परिवारवाद' के तीखे आरोपों का सामना करना पड़ेगा।
भितरघात और गुटबाजी: 12 में से 8 मंडल प्रमुखों की सीधी महत्वाकांक्षा से टिकट वितरण के समय भारी खींचतान मचेगी। जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा, उनकी नाराजगी दूर करना और अंदरूनी भितरघात को रोकना भाजपा नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान होगा।