'सिर्फ गोरे जाएं और काले अंग्रेज बैठें, तो आजादी कैसी?' जानिए इतिहासकार चमन लाल के खुलासे
इतिहासकार चमन लाल के अनुसार, शहीद-ए-आजम भगत सिंह सिर्फ एक भावुक राष्ट्रवादी नहीं, बल्कि एक पक्के मार्क्सवादी विचारक थे। जानिए महात्मा गांधी, नेहरू और सुभाष चंद्र बोस पर क्या थे उनके विचार और क्यों उन्होंने अपना आखिरी भोजन एक दलित के हाथों बनवाया था।
yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026Sub Editor
September 28, 2026 • 2:41 PM 6
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28 Sep 2026
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साल 1931 में मात्र 23 वर्ष की आयु में फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम आज भी युवाओं के रगों में जोश भर देता है। उनका करिश्मा ऐसा है कि पाकिस्तान के कई संगठन भी आज उन्हें अपना हीरो मानते हैं। लेकिन अक्सर भगत सिंह को केवल एक 'बंदूकधारी क्रांतिकारी' के रूप में पेश किया जाता है, जबकि उनके बौद्धिक विचार इससे कहीं अधिक गहरे थे।
हाल ही में प्रमुख इतिहासकार चमन लाल (जिन्होंने भगत सिंह के कम ज्ञात बौद्धिक कार्यों को संकलित किया है) ने एक बातचीत के दौरान उनके विचारों की गहराईयों को खोला है। आइए जानते हैं भगत सिंह के उन विचारों को, जो आज के समय में भी बेहद प्रासंगिक हैं।
भगत सिंह का एक मार्क्सवादी क्रांतिकारी के रूप में विकसित होने का सफर 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना और बाद में 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी' (HRA) को 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) में बदलने के साथ शुरू हुआ। संगठन के नाम में 'सोशलिस्ट' (समाजवादी) शब्द का जुड़ना क्रांतिकारियों की वैचारिक परिपक्वता का प्रमाण था।
चन्द्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला खान के साथ मिलकर शुरू हुई यह लड़ाई केवल ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ नहीं थी। भगत सिंह आयरिश और बोल्शेविक जैसी वैश्विक क्रांतियों का लगातार अध्ययन कर रहे थे। 1924 के अपने एक निबंध में, उन्होंने भारतीय दर्शन 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) का हवाला देते हुए भविष्य के एक 'विश्व संघ' की कल्पना की थी। उनका स्पष्ट मानना था कि किसानों और मजदूरों की समाजवादी क्रांति के बिना सच्ची आज़ादी संभव नहीं है।
महात्मा गांधी और उनकी नीतियों पर क्या सोचते थे भगत सिंह?
भगत सिंह और उनके साथी महात्मा गांधी की जनता से जुड़ने की क्षमता का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों से गांधी जी के इस गुण को सीखने की अपील भी की थी। लेकिन, उनका स्पष्ट मानना था कि गांधीवादी आंदोलन अंततः बिना किसी बड़े बदलाव के 'समझौते' पर खत्म हो जाएगा। उन्हें लगता था कि गांधी के विचार आर्थिक और सामाजिक समानता लाने में सक्षम नहीं हैं।
गांधी-इरविन समझौते के दौरान गांधी जी द्वारा क्रांतिकारियों की फांसी रुकवाने के प्रयास पर भी इतिहासकारों में बहस होती है। इतिहासकार चमन लाल का मानना है कि गांधी जी ने प्रयास तो किए, लेकिन उसमें नेहरू और बोस जैसा जुनून नहीं था। गांधी जी को मृत्युदंड के खिलाफ अपने सैद्धांतिक रुख पर दृढ़ रहना चाहिए था। हालांकि, यह भी एक सच है कि यदि गांधी जी फांसी रुकवा भी लेते, तो क्रांतिकारी किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे अपनी शहादत से भारतीय जनता को जगाना चाहते थे।
बोस बनाम नेहरू: भावनाओं और तर्क का अंतर
सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू, दोनों के साथ भगत सिंह के बेहतरीन व्यक्तिगत संबंध थे (बोस के साथ थोड़े अधिक घनिष्ठ)। लेकिन वैचारिक स्तर पर भगत सिंह, नेहरू के तर्कसंगत और समाजवादी विचारों को अधिक तरजीह देते थे।
भगत सिंह का मानना था कि सुभाष चंद्र बोस अत्यधिक भावुक हैं और इसलिए वे एक 'विद्रोही' (Rebel) हैं। वहीं, नेहरू अधिक तर्कसंगत और यथार्थवादी थे, इसलिए भगत सिंह उन्हें एक 'क्रांतिकारी' (Revolutionary) मानते थे। वे चाहते थे कि देश का युवा नेहरू की तार्किक सोच का अनुसरण करे।
धर्म-आधारित राजनीति की खामोशी और पेरियार का खुला समर्थन
यह एक ऐतिहासिक विडंबना है कि भगत सिंह और उनके साथियों की भूख हड़ताल और फांसी के दौरान किसी भी धर्म-आधारित राजनीतिक संगठन (जैसे सावरकर) ने उनके पक्ष में एक शब्द नहीं कहा। इसके विपरीत, मोहम्मद अली जिन्ना, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं ने उनके साथ जेल में हो रहे क्रूर व्यवहार पर तीखी नाराजगी जताई थी।
दक्षिण भारत में महान समाज सुधारक 'पेरियार' ने अपनी तमिल पत्रिका 'कुदी अरासु' में क्रांतिकारियों की फांसी पर पहला कड़ा संपादकीय लिखा था और 1934 में भगत सिंह के प्रसिद्ध लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' का तमिल अनुवाद भी प्रकाशित करवाया था।
छुआछूत का कड़ा विरोध और अंतिम भोजन
भगत सिंह जातिवाद और छुआछूत के घोर विरोधी थे। अपने निबंध 'छुआछूत की समस्या' में उन्होंने इसके खिलाफ बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने 'नौजवान भारत सभा' के मंच से सभी धर्मों और समुदायों के लिए साझा लंगर की शुरुआत की थी।
सबसे भावुक कर देने वाला वाकया उनकी फांसी से पहले का है, जब उन्होंने जेल में अपना अंतिम भोजन 'बोघा' नामक एक दलित कैदी के हाथों से पकवाकर खाने की इच्छा जताई थी।
भगत सिंह का लक्ष्य सिर्फ अंग्रेजों को भगाना नहीं था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यदि शोषक व्यवस्था वही रहती है, तो शासन लॉर्ड इरविन के हाथ में हो या सर तेज बहादुर सप्रू के, आम जनता के लिए इसका कोई मतलब नहीं है। उनका सपना एक सच्चे समाजवादी और समतामूलक भारत का निर्माण था।