पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर की कहानी: कैसे शुरू हुआ POK और क्यों आज भी जारी है विवाद?

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) और गिलगित-बाल्टिस्तान में ‘Punjabization’ को लेकर बहस तेज हो गई है।

Kashish Sain
Kashish Sain Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor
June 15, 2026 • 2:25 PM  6
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पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर की कहानी: कैसे शुरू हुआ POK और क्यों आज भी जारी है विवाद?

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) और गिलगित-बाल्टिस्तान में पिछले कुछ वर्षों से एक शब्द लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है—‘Punjabization’। हाल ही में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के विरोध प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है। स्थानीय संगठनों और अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता और पंजाब-प्रभुत्व वाली संस्थाओं ने धीरे-धीरे इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बढ़ा लिया है।

हालांकि ‘Punjabization’ को केवल पंजाबी भाषा या संस्कृति के विस्तार के रूप में नहीं देखा जाता। आलोचकों के अनुसार यह एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसके तहत प्रशासन, राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और संसाधनों पर पंजाब से जुड़े प्रभावशाली वर्गों का नियंत्रण बढ़ा है।

दरअसल, POK और गिलगित-बाल्टिस्तान ऐतिहासिक रूप से विविध समुदायों और भाषाओं वाला क्षेत्र रहा है। यहां गुर्जर, जाट, राजपूत, सुधान, अवान, मुगल और पश्तून समुदाय निवास करते हैं, जबकि कश्मीरी, पहाड़ी, पंजाबी, हिंदको, बलती और शीना जैसी भाषाएं बोली जाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि POK के कुछ दक्षिणी क्षेत्रों का सांस्कृतिक संबंध लंबे समय से पंजाब के पोठोहार इलाके से रहा है, इसलिए पूरे क्षेत्र को एक समान सांस्कृतिक पहचान से जोड़ना सही नहीं होगा।

इस बहस की जड़ें 1949 के कराची समझौते तक पहुंचती हैं। इस समझौते के बाद रक्षा, विदेश नीति और कश्मीर से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों का नियंत्रण पाकिस्तान की केंद्र सरकार को सौंप दिया गया था। आलोचकों का दावा है कि इसके बाद से स्थानीय संस्थाओं की भूमिका सीमित होती गई और वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हाथों में केंद्रित हो गई।

POK में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और विधानसभा जैसी संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन स्थानीय संगठनों का आरोप है कि बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक फैसले अब भी केंद्रीय सत्ता द्वारा लिए जाते हैं। यही वजह है कि क्षेत्र में अधिक स्वायत्तता और अधिकारों की मांग समय-समय पर उठती रही है।

JAAC और अन्य संगठनों का कहना है कि प्रशासन, सुरक्षा तंत्र और नौकरशाही में पंजाब से आने वाले अधिकारियों का प्रभाव काफी अधिक है। उनके अनुसार स्थानीय नेताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए चुना जरूर जाता है, लेकिन महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भूमिका सीमित रहती है।

गिलगित-बाल्टिस्तान में यह विवाद और अधिक संवेदनशील माना जाता है। लंबे समय तक इस क्षेत्र को सीधे इस्लामाबाद से संचालित किया गया और वहां के लोगों को संवैधानिक अधिकारों तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लगातार शिकायतें रही हैं। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी स्थानीय भागीदारी की कमी का उल्लेख किया गया है।

पंजाबाइजेशन की बहस में जनसंख्या बदलाव का मुद्दा भी प्रमुख है। स्थानीय समूहों का आरोप है कि बाहरी लोगों के बसने और भूमि खरीद संबंधी नियमों में बदलाव के बाद क्षेत्र की जनसांख्यिकी प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि इससे स्थानीय पहचान और सामाजिक ढांचे पर असर पड़ा है। हालांकि पाकिस्तान सरकार इन आरोपों को स्वीकार नहीं करती और इन्हें प्रशासनिक सुधारों का हिस्सा बताती है।

विश्लेषकों के अनुसार ‘Punjabization’ का विवाद केवल भाषा या संस्कृति तक सीमित नहीं है। यह सत्ता, संसाधनों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक नियंत्रण और स्थानीय पहचान से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है। यही कारण है कि POK में जब भी स्वायत्तता, अधिकारों या क्षेत्रीय पहचान की चर्चा होती है, पंजाबाइजेशन का सवाल फिर केंद्र में आ जाता है।

फिलहाल यह बहस POK और गिलगित-बाल्टिस्तान की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। समर्थक इसे प्रशासनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकीकरण का प्रयास मानते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक नियंत्रण और जनसांख्यिकीय बदलाव की दीर्घकालिक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं।

Kashish Sain

Kashish Sain Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor

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