जानिए क्या है मारवाड़ का सोना: केर और सांगरी – रेगिस्तान की धरोहर और स्वाद की कहानी

मारवाड़ की माटी में रेगिस्तान की तपिश के बीच खिलता है जीवन का अनमोल स्वाद – केर और सांगरी। बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर जैसे क्षेत्रों में यह प्रकृति का खजाना हर थाली का गौरव है। अप्रैल-मई में खेजड़ी के पेड़ और केर के झाड़ फलियों व फलों से लद जाते हैं, और गांवों में रौनक छा जाती है। सड़क किनारे लारियों पर बिकते हरे और सूखे केर-सांगरी न केवल स्वाद, बल्कि मेहनत और संस्कृति की कहानी कहते हैं। विक्रेताओं की जिंदगी से लेकर मारवाड़ी थाली तक, यह व्यंजन प्रकृति और परंपरा का अनूठा संगम है। बाड़मेर के बाजारों में यह धरोहर न केवल स्थानीय गर्व है, बल्कि विश्व भर में राजस्थान की पहचान को मजबूत करती है। आइए, इस स्वाद और कहानी के सफर में शामिल हों।

Ashok Shera
Ashok Shera Official | Verified Expert • 11 Jun, 2026 Editor
April 13, 2025 • 5:23 PM  76
राजस्थान
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जानिए क्या है मारवाड़ का सोना: केर और सांगरी – रेगिस्तान की धरोहर और स्वाद की कहानी
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13 Apr 2025
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जानिए क्या है मारवाड़ का सोना: केर और सांगरी – रेगिस्तान की धरोहर और स्वाद की कहानी
बाजार में बिकते केर और साँगरी

मारवाड़ की माटी, वह पवित्र धरती जहां रेगिस्तान की तपिश भी जीवन की रंगत को फीका नहीं कर पाती। यह भूमि, जो अपनी समृद्ध संस्कृति, गौरवशाली इतिहास और अनूठी परंपराओं के लिए विश्व भर में विख्यात है, एक ऐसी अनमोल देन के लिए भी जानी जाती है, जिसने स्वाद और सुगंध की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी है – केर और सांगरी। राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, नागौर और बीकानेर जैसे क्षेत्रों में ये दोनों प्रकृति के अनमोल रत्न हर घर की थाली का अभिन्न हिस्सा हैं। ये न केवल भोजन का स्वाद बढ़ाते हैं, बल्कि मारवाड़ के लोगों के संघर्ष, धैर्य और प्रकृति के साथ सामंजस्य की कहानी भी कहते हैं।

#### केर और सांगरी का मौसम: रेगिस्तान में उत्सव
हर साल अप्रैल से मई के बीच, जब खेजड़ी के पेड़ और केर के झाड़ हरे-भरे फलों और फलियों से लद जाते हैं, तब मारवाड़ के गांवों में उत्सव-सा माहौल छा जाता है। केर, एक छोटा-सा कांटेदार फल, जो रेगिस्तान की कठिन परिस्थितियों में भी अपनी जगह बनाता है, और सांगरी, खेजड़ी की लंबी, पतली फलियां, जो पेड़ की शाखाओं पर लटकती हैं – ये दोनों प्रकृति का ऐसा उपहार हैं, जो ताजा हों या सूखे, हर रूप में अनमोल हैं। सूखने के बाद इनका स्वाद और मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं, जिसके चलते इन्हें “मारवाड़ का सोना” कहा जाता है। इनकी मांग अब स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश-विदेश की रसोइयों में भी यह जोड़ी अपनी जगह बना चुकी है।

Ashok Shera Official | Verified Expert • 11 Jun, 2026 Editor

"द खटक" एडिटर-इन-चीफ

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