BJP विधायक की बेटी पर फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र से नौकरी हासिल करने का आरोप.

ब्यावर (अजमेर) से बीजेपी विधायक शंकर सिंह रावत की बेटी कंचन चौहान, जो करेड़ा (भीलवाड़ा) में तहसीलदार हैं, पर फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र से सरकारी नौकरी हासिल करने का आरोप लगा है। निदेशालय विशेष योग्यजन ने मामले की जांच की सिफारिश की है। यह मामला राजस्थान में फर्जी प्रमाणपत्रों के रैकेट का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे बीजेपी की छवि और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

Basanti Parmar
Basanti Parmar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor
September 4, 2025 • 2:16 PM  31
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BJP विधायक की बेटी पर फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र से नौकरी हासिल करने का आरोप.
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BJP विधायक की बेटी पर फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र से नौकरी हासिल करने का आरोप.

अजमेर जिले के ब्यावर से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विधायक शंकर सिंह रावत की बेटी कंचन चौहान पर फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त करने का गंभीर आरोप लगा है। कंचन चौहान वर्तमान में राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के करेड़ा में तहसीलदार के पद पर कार्यरत हैं। इस मामले में निदेशालय विशेष योग्यजन ने जांच की सिफारिश की है, जिसने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है।

आरोपों का विवरण

कंचन चौहान पर आरोप है कि उन्होंने दिव्यांग कोटे के तहत फर्जी प्रमाणपत्र का उपयोग करके तहसीलदार के पद पर नियुक्ति हासिल की। यह मामला तब सुर्खियों में आया जब कुछ शिकायतकर्ताओं ने उनके प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए। प्रारंभिक जांच में संदेह जताया गया है कि कंचन द्वारा प्रस्तुत दिव्यांग प्रमाणपत्र में अनियमितताएं हो सकती हैं, जिसके आधार पर निदेशालय विशेष योग्यजन ने इसकी विस्तृत जांच की सिफारिश की है।

निदेशालय विशेष योग्यजन की भूमिका

निदेशालय विशेष योग्यजन, जो राजस्थान में दिव्यांग व्यक्तियों के कल्याण और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है, ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। निदेशालय ने कंचन चौहान के दिव्यांग प्रमाणपत्र की वैधता की जांच के लिए एक कमेटी गठित करने का प्रस्ताव रखा है। यह जांच इस बात की तह तक जाएगी कि क्या कंचन ने वास्तव में फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया या उनके प्रमाणपत्र वैध हैं।

राजस्थान में फर्जी प्रमाणपत्रों का रैकेट

यह मामला राजस्थान में फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्रों के जरिए सरकारी नौकरियां हासिल करने के व्यापक रैकेट का हिस्सा माना जा रहा है। हाल ही में आजतक की एक रिपोर्ट में इस तरह के रैकेट का खुलासा हुआ था, जिसमें बताया गया कि कई लोग फर्जी मूक-बधिर या दृष्टिहीन प्रमाणपत्रों के जरिए नौकरियां प्राप्त कर रहे हैं। इस खुलासे के बाद राज्य सरकार ने सख्ती दिखाते हुए जांच के लिए एक सात सदस्यीय कमेटी गठित की थी, जिसकी अध्यक्षता स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त निदेशक नरोत्तम शर्मा कर रहे हैं। इस कमेटी ने सवाई मान सिंह (एसएमएस) अस्पताल में प्रमाणपत्रों की जांच शुरू कर दी है, और अब तक 100 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की गई है, जिन्होंने फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए नौकरियां हासिल की हैं। 

कंचन चौहान और शंकर सिंह रावत का पक्ष

अभी तक कंचन चौहान या उनके पिता शंकर सिंह रावत की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, यह उम्मीद की जा रही है कि जांच के दौरान उनका पक्ष भी सामने आएगा। शंकर सिंह रावत ब्यावर से बीजेपी के विधायक हैं और क्षेत्र में उनकी अच्छी-खासी राजनीतिक पकड़ मानी जाती है। इस मामले के सामने आने से उनकी छवि पर भी असर पड़ सकता है, खासकर तब जब जांच में कंचन के खिलाफ कोई ठोस सबूत मिलते हैं।

जांच का दायरा और संभावित परिणाम

निदेशालय विशेष योग्यजन की जांच में कंचन चौहान के प्रमाणपत्रों की गहन पड़ताल की जाएगी। इसमें उनके मेडिकल रिकॉर्ड, प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था की विश्वसनीयता, और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच शामिल होगी। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो कंचन चौहान को न केवल अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है, बल्कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। इसके अलावा, इस मामले से बीजेपी की छवि पर भी सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि शंकर सिंह रावत पार्टी के एक प्रमुख नेता हैं।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

यह मामला न केवल कंचन चौहान और उनके परिवार के लिए, बल्कि राजस्थान की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए नौकरी हासिल करने के मामले न केवल असली दिव्यांग उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन करते हैं, बल्कि सरकारी प्रणाली की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाते हैं। समाजसेवी संगठनों, जैसे ऑल इंडिया दिव्यांग सोसाइटी, ने इस तरह के रैकेट्स के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। 

कंचन चौहान पर लगे फर्जी प्रमाणपत्र के आरोप और निदेशालय विशेष योग्यजन द्वारा जांच की सिफारिश ने इस मामले को गंभीर बना दिया है। यह जांच न केवल कंचन की नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाएगी, बल्कि राजस्थान में फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए नौकरी हासिल करने की प्रवृत्ति को भी उजागर करेगी। आने वाले दिनों में इस जांच के परिणाम और इसके राजनीतिक व सामाजिक प्रभाव पर सभी की नजरें रहेंगी।

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