10 लाख कमाओ और ले जाओ PhD की डिग्री! ये नया नियम सुनकर झूम उठेंगे छात्र
भारत में प्रैक्टिकल पीएचडी की शुरुआत हो गई है। आईआईटी रोपड़ ने इनोवेशन-ड्रिवन मॉडल पेश किया है, जहां थीसिस लिखने के बजाय स्टार्टअप और प्रोडक्ट बनाकर पीएचडी की डिग्री मिलेगी। द खटक की इस रिपोर्ट में जानें पूरी जानकारी।



सालों से चली आ रही पीएचडी की पारंपरिक व्यवस्था अब पूरी तरह बदलने जा रही है। रिसर्च के नाम पर सैकड़ों पन्नों की थीसिस लिखने और भारी-भरकम किताबों को खंगालने की मजबूरी अब खत्म होने वाली है। आईआईटी रोपड़ (IIT Ropar) ने भारत में पहली बार 'प्रोडक्ट/स्टार्टअप बेस्ड पीएचडी मॉडल' की शुरुआत की है। इस नए सिस्टम के तहत, स्कॉलर्स असल दुनिया की समस्याओं को सुलझाने वाले प्रोडक्ट बनाकर या अपना स्टार्टअप खड़ा करके डॉक्टरेट की उपाधि हासिल कर सकेंगे। द खटक की इस रिपोर्ट में हम आपको इस अहम शैक्षणिक बदलाव की पूरी जानकारी दे रहे हैं।
थीसिस नहीं, अब प्रैक्टिकल नॉलेज और इनोवेशन पर होगा फोकस
पारंपरिक पीएचडी व्यवस्था में एक रिसर्च स्कॉलर को अपनी डिग्री पूरी करने के लिए 3 से 6 साल तक कड़ी मेहनत करनी होती है। इसमें किसी एक विषय पर लंबी स्टडी, डिटेल्ड थीसिस और जर्नल्स में पेपर पब्लिश करवाना अनिवार्य होता है। लेकिन आईआईटी रोपड़ का यह नया 'इनोवेशन-ड्रिवन' मॉडल इससे बिल्कुल अलग है। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर राजीव आहूजा के अनुसार, अब बेहतर करियर के लिए सिर्फ किताबी डिग्री काफी नहीं है, बल्कि मार्केट के हिसाब से स्किल्स होना जरूरी है। इसी वजह से पीएचडी को कागजी लिखाई से निकालकर प्रैक्टिकल अप्रोच में ढाला जा रहा है।
डिग्री हासिल करने के तीन मुख्य विकल्प
आईआईटी रोपड़ के इस नए इनोवेशन-ड्रिवन पीएचडी मॉडल के तहत रिसर्च स्कॉलर्स के पास डॉक्टरेट की उपाधि पाने के लिए मुख्य रूप से तीन रास्ते होंगे:
पेटेंट: स्कॉलर्स अपनी किसी नई रिसर्च या तकनीक का पेटेंट करा सकते हैं और उसे आधिकारिक ग्रांट दिला सकते हैं।
स्टार्टअप और कमाई: स्टूडेंट्स एक नई कंपनी या स्टार्टअप खड़ा कर सकते हैं। प्रोफेसर आहूजा के मुताबिक, स्कॉलर्स को इसमें पूरी आजादी दी जाएगी; उन्हें बस एक प्रोडक्ट बेचना है, उससे 10 लाख रुपये कमाने हैं और उन्हें पीएचडी की डिग्री दे दी जाएगी।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: अगर कोई छात्र अपनी विकसित की गई तकनीक किसी कंपनी को ट्रांसफर करता है, तो कंपनी उस प्रोडक्ट का निर्माण और बिक्री करेगी, जबकि आविष्कारक छात्र को उसकी रॉयल्टी मिलती रहेगी।
चीन के बाद अब भारत में भी बदलाव की लहर
पीएचडी को सीधे तौर पर प्रैक्टिकल उपलब्धियों से जोड़ने वाला भारत पहला देश नहीं है। हाल ही में चीन ने भी ऐसी ही व्यवस्था लागू की है। फरवरी 2026 में साइंस मैगजीन 'नेचर' (Nature) की एक रिपोर्ट में चीन की पहली प्रैक्टिकल पीएचडी का जिक्र किया गया था। वहां सिविल इंजीनियरिंग के एक स्कॉलर ने बिना कोई लिखित थीसिस जमा किए, सिर्फ एक 'ब्रिज-पायलॉन' (पुल के खंभे) प्रोडक्ट तैयार करके अपनी पीएचडी पूरी की थी। अब यही प्रैक्टिकल मॉडल भारत में भी अपनाया जा रहा है, जो आने वाले समय में भारतीय युवाओं और रिसर्च स्कॉलर्स के लिए बेहतर करियर के कई नए दरवाजे खोलेगा।












































