शव रोककर 'पैसे दो, बॉडी लो' का शर्मनाक खेल जयपुर के दुर्लभजी हॉस्पिटल में हंगामा, मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने सरकार की मानी कमजोरी.

संतोकबा दुर्लभजी हॉस्पिटल में बिल न चुकाने पर 24 घंटे तक शव रोके जाने से हंगामा। दौसा के विक्रम मीणा (42) की सड़क हादसे के बाद मौत हुई। परिजनों ने 6.39 लाख जमा किए, फिर भी 1.79 लाख के लिए शव अटका। कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा के हस्तक्षेप से शव सौंपा गया, अस्पताल ने 5.75 लाख लौटाए। मंत्री ने इसे 'शव के साथ खिलवाड़' बताया, सरकार की मॉनिटरिंग पर सवाल उठाए। बीजेपी अध्यक्ष राठौड़ ने कार्रवाई का भरोसा दिया, कांग्रेस ने 'कुशासन' का आरोप लगाया।

Basanti Parmar
Basanti Parmar Verified Public Figure • 11 Jun, 2026Sub Editor
October 26, 2025 • 6:55 PM  36
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राजस्थान
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शव रोककर 'पैसे दो, बॉडी लो' का शर्मनाक खेल जयपुर के दुर्लभजी हॉस्पिटल में हंगामा, मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने सरकार की मानी कमजोरी.
“शव रोककर 'पैसे दो, बॉडी लो' का शर्मनाक खेल जयपुर के दुर्लभजी हॉस्पिटल में हंगामा, मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने सरकार की मानी कमजोरी.”
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26 Oct 2025
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शव रोककर 'पैसे दो, बॉडी लो' का शर्मनाक खेल जयपुर के दुर्लभजी हॉस्पिटल में हंगामा, मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने सरकार की मानी कमजोरी.

जयपुर, 26 अक्टूबर 2025: राजस्थान की राजधानी जयपुर के प्रतिष्ठित संतोकबा दुर्लभजी मेमोरियल हॉस्पिटल (SDMH) में एक ऐसी घटना घटी, जो न सिर्फ चिकित्सा व्यवस्था की पोल खोल रही है, बल्कि इंसानियत की हदें पार कर गई है। एक गरीब परिवार के इकलौते कमाने वाले विक्रम मीणा (42) की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद अस्पताल प्रशासन ने शव सौंपने से साफ इनकार कर दिया। वजह? बकाया 1.79 लाख रुपये का बिल! परिवार ने पहले ही 6.39 लाख रुपये जमा कर दिए थे, लेकिन अस्पताल ने अतिरिक्त राशि न देने पर 24 घंटे तक शव को मोर्चरी में बंधक बना रखा। इस अमानवीय हरकत पर आक्रोशित परिवार ने कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा से गुहार लगाई, जो सुबह 10:30 बजे खुद अस्पताल पहुंचे। मंत्री के हस्तक्षेप के बाद ही शव परिवार को सौंपा गया, लेकिन इस दौरान अस्पताल परिसर में ग्रामीणों और परिजनों ने जोरदार नारेबाजी की। मंत्री ने इसे 'शव के साथ खिलवाड़' करार देते हुए अपनी ही सरकार की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए।

क्या है पूरा मामला? एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे से शुरू हुई दर्दनाक कहानी

यह घटना दौसा जिले के महवा उपखंड के बालाजी मोड़ से जुड़ी है। 13 अक्टूबर को विक्रम मीणा का एक सड़क हादसे में गंभीर रूप से चोटिल होने के बाद परिजन उन्हें तुरंत जयपुर के दुर्लभजी हॉस्पिटल की इमरजेंसी में भर्ती कराया। विक्रम परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था, और उसके रिश्तेदार जगराम मीणा ने बताया कि अस्पताल ने शुरू से ही सरकारी योजनाओं का लाभ देने से साफ मना कर दिया। परिजनों के अनुसार, अस्पताल प्रशासन ने आयुष्मान भारत योजना और मुख्यमंत्री चिरंजीवी योजना (मां योजना) के तहत मुफ्त इलाज से इनकार करते हुए कहा, "हम केवल कैश पेमेंट पर इलाज करते हैं।" 13 दिनों के लंबे संघर्ष के दौरान इलाज का बिल 8 लाख रुपये से अधिक हो गया। परिजन ने कर्ज लेकर और संपत्ति बेचकर 6.39 लाख रुपये जमा कर दिए, लेकिन शनिवार दोपहर विक्रम की सांसें थम गईं। अस्पताल ने तुरंत शव सौंपने से इंकार कर दिया और बकाया 1.79 लाख रुपये जमा करने की शर्त रख दी। जगराम ने बताया, "हम गरीब हैं, इतना पैसा कहां से लाते? परिवार रो-रोकर बेकाबू हो गया था। पुलिस भी आई, लेकिन डॉक्टर विजयंत शर्मा ने साफ कहा- पैसे बिना बॉडी नहीं मिलेगी।"यह कोई पहला मामला नहीं है। मंत्री मीणा ने खुलासा किया कि उन्हें इसी हॉस्पिटल से जुड़े कई शिकायतें मिल चुकी हैं। उदाहरण के तौर पर, अपेक्स हॉस्पिटल में 14 अक्टूबर को भर्ती मोनू मीणा को सिर्फ एक दिन के इलाज पर 8.5 लाख का बिल थमा दिया गया था। इसी तरह, टोंक रोड के एक अन्य अस्पताल ने भी भारी-भरकम बिल बनाकर मरीजों को परेशान किया। बालाजी पुलिस स्टेशन के अधिकारी गोविंद सिंह ने पुष्टि की कि शनिवार शाम 7 बजे वे अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन बिना पेमेंट के शव देने से मना कर दिया गया।

मंत्री का दखल: आधे घंटे की बातचीत से सुलझा विवाद, लेकिन सवाल बाकी

परिजनों की शिकायत मिलते ही रविवार सुबह कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा अस्पताल पहुंचे। वहां परिसर में उमड़ आई भीड़ के बीच उन्होंने पहले परिवार से गहन बातचीत की, फिर अस्पताल प्रशासन के चीफ एडमिनिस्ट्रेटर जॉर्ज थॉमस और डॉक्टरों से सवाल-जवाब किए। करीब आधे घंटे की इस चर्चा के बाद अस्पताल ने शव सौंप दिया। मंत्री ने मीडिया से बातचीत में गुस्से से कहा, "यह शव के साथ खिलवाड़ है। हॉस्पिटल को जमीन सरकार ने सिर्फ एक रुपये में दी थी, फिर भी वे गरीबों से लाखों वसूल रहे हैं।" उन्होंने गांधीनगर थाने को निर्देश दिए कि पीड़ित परिवार की शिकायत पर अस्पताल के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए। मीणा ने आगे कहा, "प्रदेश के निजी अस्पताल सरकारी योजनाओं में रजिस्टर्ड हैं, लेकिन मरीजों को इसका फायदा नहीं मिल रहा। जनाधार कार्ड एक्टिव न होने का बहाना बनाकर कैश वसूली हो रही है।" उन्होंने मुख्य सचिव से बात की है, लेकिन अभी मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से चर्चा नहीं हो पाई। मीणा ने स्वीकार किया, "यह हमारी सरकार की कमजोरी है- मॉनिटरिंग की कमी। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे।"

अस्पताल का पक्ष: 'डिस्काउंट दिया, लेकिन सहमति थी कैश की'

अस्पताल प्रशासन ने अपना बचाव करते हुए कहा कि मरीज को दूसरे अस्पताल से रेफर कर लाया गया था और जनाधार कार्ड एक्टिव नहीं होने के कारण वे सरकारी योजना के तहत इलाज नहीं कर सकते। चीफ एडमिनिस्ट्रेटर जॉर्ज थॉमस ने बताया, "परिजनों ने कैश में इलाज की लिखित सहमति दी थी। हमने मरीज को बचाने के लिए सर्वोत्तम उपचार दिया, लेकिन दुर्भाग्य से मौत हो गई। हमने 80 हजार रुपये का डिस्काउंट भी दिया।" विवाद सुलझने के बाद अस्पताल ने जमा 5.75 लाख रुपये मृतक की पत्नी के नाम तीन अलग-अलग चेकों से लौटा दिए। थॉमस ने जोर देकर कहा, "हम सेवा के क्षेत्र में हैं, लेकिन नियमों का पालन जरूरी है।"

राजनीतिक रंग: बीजेपी अध्यक्ष का बचाव, कांग्रेस का हमला

इस घटना ने राजनीतिक घमासान भी मचा दिया। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा, "सरकार ने कानून और व्यवस्था बना रखी है, सबको इसका पालन करना होगा। जहां अवहेलना हो, कार्रवाई होगी। मॉनिटरिंग पूरी है।" उन्होंने निजी अस्पतालों से अपील की, "मानवता दिखानी चाहिए, धन सब कुछ नहीं। अस्पताल सेवा का केंद्र हैं, फीस के नाम पर शव रोकना गलत है।"वहीं, कांग्रेस नेता टीका राम जूली ने ट्वीट कर सरकार पर तीखा प्रहार किया: "बीजेपी के डेढ़-दो साल के कुशासन में राजस्थान का स्वास्थ्य क्षेत्र बर्बाद हो गया। जयपुर के एसडीएमएच में सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला, बिल न चुकाने पर बॉडी रोकी गई। हालात इतने खराब हैं कि अपनी ही सरकार के मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा को बोलना पड़ रहा है।" जूली ने इसे 'स्वास्थ्य लूट का प्रतीक' बताया।

व्यापक चिंता: निजी अस्पतालों पर सवाल, क्या होगा आगे?

यह घटना राजस्थान के निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की गंभीर समस्याओं को उजागर करती है। दुर्लभजी जैसे बड़े अस्पताल आयुष्मान और चिरंजीवी योजना से जुड़े होने के बावजूद गरीबों को लाभ से वंचित रख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बिलिंग में पारदर्शिता की कमी और मॉनिटरिंग की अनदेखी से ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। मंत्री मीणा के बयान से साफ है कि सरकार अब सख्ती की तैयारी में है, लेकिन क्या यह सिर्फ बयानबाजी साबित होगी या वास्तविक बदलाव लाएगी? परिवार ने मंत्री को धन्यवाद देते हुए कहा, "बाबा (मीणा) के बिना हमारा क्या होता?" यह मामला न सिर्फ एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का आईना। उम्मीद है कि इससे सबक लेकर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा, ताकि कोई और परिवार ऐसी यातना न झेले।

Basanti Parmar

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