नागौर में गोचर भूमि का खेल: SDM पूनम चायल ने JK सीमेंट को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी नियमों को ताक पर रखा?
नागौर जिले में मेड़ता SDM पूनम चायल ने JK व्हाइट सीमेंट को फायदा पहुंचाने के लिए ग्राम धनापा की 10 हजार बीघा गोचर भूमि का वर्गीकरण बदलने का विवादास्पद फैसला सुनाया, जो राजस्व नियमों का उल्लंघन है। जिला कलक्टर अरुण कुमार पुरोहित ने इसे अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए अपील के निर्देश जारी किए और SDM की लापरवाही पर सवाल उठाए। यह प्रकरण सरकारी भूमि पर निजी कंपनियों के हितों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बहस छेड़ रहा है, जहां सरकार से सख्त कार्यवाही की मांग हो रही है।
नागौर जिले में एक बार फिर सरकारी भूमि पर निजी कंपनियों की नजर पड़ गई है। इस बार मामला ग्राम धनापा की करीब 10 हजार बीघा गोचर भूमि का है, जहां मेड़ता उपखंड अधिकारी (SDM) पूनम चायल ने कथित तौर पर राजस्व नियमों का उल्लंघन करते हुए एक फैसला सुनाया, जो सीधे-सीधे JK व्हाइट सीमेंट वर्क्स गोटन को फायदा पहुंचाने वाला लगता है। जिला कलक्टर अरुण कुमार पुरोहित ने इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे 'अधिकार क्षेत्र से बाहर' और 'न्यायिक विवेक से रहित' करार दिया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है या इसके पीछे बड़े हित छिपे हैं? और सरकार इस पूरे प्रकरण में कब सख्त कार्यवाही करेगी ये देखने वाली बात होगी...
42 साल पुराना नामांतरण और गोचर भूमि की लड़ाई
यह विवाद 1978-80 के दौरान दर्ज हुए नामांतरण (संख्या 411) से जुड़ा है, जिसमें धनापा की भूमि को गोचर के रूप में दर्ज किया गया था। गोचर भूमि ग्रामीण समुदायों के लिए पशु चराई और पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है, लेकिन अक्सर इसे निजी कंपनियों द्वारा हथियाने के प्रयास किए जाते हैं। JK सीमेंट ने इस पुराने नामांतरण को चुनौती देते हुए SDM पूनम चायल की कोर्ट में अपील दायर की। 10 नवंबर 2025 को SDM ने फैसला सुनाते हुए नामांतरण को खारिज कर दिया और भूमि को 'मगरा' तथा 'पहाड़' के रूप में वर्गीकृत करने का आदेश दे दिया।यह फैसला न केवल राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम का उल्लंघन है, बल्कि उच्च न्यायालय के फैसलों (जैसे गुलाब कोठारी बनाम राज्य सरकार) की भी अवहेलना करता है। नियमों के अनुसार, चारागाह भूमि के वर्गीकरण में बदलाव का अधिकार केवल जिला कलक्टर के पास है। SDM पूनम चायल के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं था, फिर भी उन्होंने 42 साल पुराने मामले को दोबारा खोलकर कंपनी के पक्ष में फैसला सुना दिया। जिला कलक्टर ने जांच में पाया कि JK सीमेंट को खनन लीज का हस्तांतरण 1987, 2006 और 2015 में हुआ, जबकि भूमि उससे पहले ही गोचर दर्ज हो चुकी थी। ऐसे में कंपनी को पुराने नामांतरण को चुनौती देने का कोई विधिक आधार ही नहीं था।