"न लिस्ट, न ऐलान... सीधे सिंबल थमाएगी कमान! राजस्थान निकाय चुनाव में BJP-कांग्रेस का 'सर्जिकल स्ट्राइक' प्लान"
राजस्थान नगर निकाय चुनाव (Rajasthan Municipal Elections) में बगावत रोकने के लिए भाजपा और कांग्रेस ने नई रणनीति बनाई है. अब प्रत्याशियों की सार्वजनिक सूची जारी करने के बजाय सीधे सिंबल बांटे जा रहे हैं. जानिए क्या है दोनों पार्टियों का मास्टरप्लान.
yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026Sub Editor
August 29, 2026 • 12:36 PM 2
र
राजनीति
NEWS CARD
“"न लिस्ट, न ऐलान... सीधे सिंबल थमाएगी कमान! राजस्थान निकाय चुनाव में BJP-कांग्रेस का 'सर्जिकल स्ट्राइक' प्लान"”
Read more onthekhatak.com/s/a4a20b
29 Aug 2026
https://thekhatak.com/s/a4a20b
Copied
राजस्थान में आगामी नगर निकाय चुनावों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद अब भाजपा और कांग्रेस ने निकाय चुनाव के लिए अपनी कमर कस ली है. इस बार दोनों ही प्रमुख दलों ने टिकट वितरण को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और नई रणनीति अपनाई है. भितरघात और बगावत के डर से दोनों पार्टियां प्रत्याशियों की सूची सार्वजनिक करने से बच रही हैं. इसकी जगह एक 'सीक्रेट फॉर्मूले' के तहत काम किया जा रहा है.
आइए जानते हैं कि क्या है यह नया फॉर्मूला और इसके पीछे दोनों पार्टियों की क्या सियासी मजबूरी है.
क्या है टिकट बंटवारे का 'सीक्रेट फॉर्मूला'?
निकाय चुनावों में अक्सर एक ही वार्ड से कई मजबूत दावेदार होते हैं. ऐसे में जब पार्टी किसी एक को टिकट देती है, तो बाकी बागी होकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर जाते हैं, जिससे पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को नुकसान होता है.
इस डैमेज कंट्रोल के लिए भाजपा और कांग्रेस ने तय किया है कि विवादित वार्डों में प्रत्याशियों की लिस्ट सार्वजनिक नहीं की जाएगी. इसके बजाय, पार्टी आलाकमान जिस नाम पर मुहर लगाएगा, उसे सीधे बुलाकर चुनाव चिन्ह (सिंबल/बी-फॉर्म) दे दिया जाएगा. इससे टिकट कटने से नाराज नेताओं को बगावत करने और निर्दलीय नामांकन भरने का समय ही नहीं मिलेगा.
ई-मेल से आएगा नाम, बंद कमरे में मिलेगा सिंबल
भारतीय जनता पार्टी इस रणनीति पर बेहद आक्रामक तरीके से काम कर रही है. 28 अगस्त को जयपुर स्थित प्रदेश मुख्यालय पर दिनभर संभागवार और जिलावार मैराथन बैठकें हुईं.
दिग्गज रहे मौजूद: बैठकों में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, प्रदेश महामंत्री संगठन अजय कुमार, राष्ट्रीय महामंत्री व निकाय चुनाव प्रभारी हरीश द्विवेदी और महाराष्ट्र से चुनाव समन्वय के लिए आए चंद्रशेखर बावनकुले सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए. बीकानेर और जोधपुर संभाग को लेकर गहन मंथन हुआ.
खाली सिंबल पर प्रदेशाध्यक्ष के हस्ताक्षर: सूत्रों के मुताबिक, जिन संभागों में रायशुमारी पूरी हो गई है, वहां के निकाय प्रभारियों को प्रदेश अध्यक्ष के हस्ताक्षर वाले खाली सिंबल थमा दिए गए हैं.
ऐसे बंटेगा टिकट: जयपुर मुख्यालय में नाम फाइनल होने के बाद संबंधित जिलाध्यक्ष और विधायक को ई-मेल के जरिए प्रत्याशी का नाम भेजा जाएगा. इसके बाद जिलाध्यक्ष गुपचुप तरीके से प्रत्याशी को बुलाकर सिंबल सौंप देंगे.
भाजपा सिर्फ टिकट वितरण ही नहीं, बल्कि 'डबल इंजन' सरकार की योजनाओं को घर-घर पहुंचाने और बूथ मैनेजमेंट पर भी पूरा फोकस कर रही है.
कांग्रेस भी चल रही इसी राह पर, जिलाध्यक्षों को दी गई कमान
भाजपा की तरह ही कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है. कांग्रेस भी कई वार्डों में प्रत्याशियों की सार्वजनिक घोषणा करने के मूड में नहीं है.
जिलाध्यक्षों के पास भेजे सिंबल: कांग्रेस ने कई जिलों में अपने जिलाध्यक्षों को सिंबल भेजने शुरू कर दिए हैं. स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों और वार्ड के सियासी समीकरणों को देखते हुए जिलाध्यक्षों को प्रत्याशी चयन में अहम पावर दी गई है.
दोहरी रणनीति: कांग्रेस ने यह फॉर्मूला सभी वार्डों के लिए अनिवार्य नहीं किया है. जिन वार्डों में केवल एक नाम पर सहमति है, वहां सामान्य तरीके से लिस्ट जारी हो सकती है. लेकिन, जहां खींचतान या विवाद है, वहां सीधे रिटर्निंग ऑफिसर तक या उम्मीदवार तक सिंबल पहुंचाने की रणनीति अपनाई जा रही है.
क्यों अपनानी पड़ी यह रणनीति?
बगावत पर लगाम: निकाय चुनावों में हार-जीत का अंतर बहुत कम होता है. ऐसे में एक भी बागी उम्मीदवार पार्टी का खेल बिगाड़ सकता है.
गोपनीयता: आखिरी समय तक नाम को लेकर सस्पेंस बनाए रखने से अन्य दावेदारों को विरोध प्रदर्शन करने का मौका नहीं मिलेगा.
स्थानीय समीकरण: विधानसभा या लोकसभा के मुकाबले निकाय चुनावों में वार्ड स्तर का व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय समीकरण ज्यादा मायने रखते हैं. आखिरी मौके पर सिंबल देने से विपक्षी दल को रणनीति बदलने का समय नहीं मिलता.
भाजपा और कांग्रेस की यह सतर्कता बताती है कि निकाय चुनाव दोनों ही दलों के लिए साख का सवाल बन गए हैं. पार्टी नेतृत्व किसी भी तरह का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिना नाम सार्वजनिक किए सिंबल थमाने की यह रणनीति चुनाव नतीजों में कितनी कारगर साबित होती है और क्या पार्टियां वाकई में बगावत को रोकने में सफल हो पाएंगी?