100 सीटों पर चंद्रशेखर आजाद की चुनौती: दलित वोटों का समीकरण कैसे बदलेगा?

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में दलित वोटों के लिए एनडीए और महागठबंधन में होड़ है, लेकिन चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी की एंट्री ने दलित-मुस्लिम एकता के जरिए सियासी समीकरण बदलने की संभावना जगाई है। यह कदम चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और मायावती की बसपा के लिए चुनौती बन सकता है।

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Web Desk Verified Media or Organization • 11 Jun, 2026 Sub Editor
July 16, 2025 • 11:41 AM  2.3k
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100 सीटों पर चंद्रशेखर आजाद की चुनौती: दलित वोटों का समीकरण कैसे बदलेगा?
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16 Jul 2025
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100 सीटों पर चंद्रशेखर आजाद की चुनौती: दलित वोटों का समीकरण कैसे बदलेगा?

बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं, और इस बार दलित वोट बैंक को साधने की जंग ने नया मोड़ ले लिया है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और महागठबंधन के बीच दलित वोटों को लेकर कड़ा मुकाबला है, लेकिन इस बीच भीम आर्मी के प्रमुख और आजाद समाज पार्टी (कांशी राम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद की एंट्री ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। चंद्रशेखर ने बिहार की 40 विधानसभा सीटों पर अपने प्रभारियों की सूची जारी कर चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान किया है, जिससे दलित राजनीति में एक नया वैकल्पिक नेतृत्व उभरने की संभावना दिख रही है।

दलित वोटों का महत्व और बिखराव

बिहार में दलित आबादी करीब 20 फीसदी है, जो राज्य की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाती है। दलित वोटों में रविदास समाज (31 फीसदी), पासवान या दुसाध (30 फीसदी), और मुसहर या मांझी (14 फीसदी) का प्रमुख हिस्सा है। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए 38 सीटें आरक्षित हैं, जिनमें से वर्तमान में एनडीए के पास 21 और महागठबंधन के पास 17 सीटें हैं। हालांकि, जेएनयू के राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हरीश एस वानखेड़े के अनुसार, दलितों का राजनीतिक प्रभाव उप-जातिगत विभाजनों और प्रतिस्पर्धी नेतृत्व के कारण बिखरा हुआ है। आर्थिक अभाव और सामाजिक असमानताओं ने भी दलित समुदाय की एकजुटता को प्रभावित किया है।

चंद्रशेखर आजाद: नया नेतृत्व, नई उम्मीद

पिछले कुछ वर्षों में चंद्रशेखर आजाद एक आक्रामक, मुखर और संघर्षशील दलित नेता के रूप में उभरे हैं। उनकी छवि युवा और जुझारू नेता की है, जो दलित-मुस्लिम एकता के फॉर्मूले पर काम करने की रणनीति बना रहे हैं। उनकी आजाद समाज पार्टी ने बिहार की 40 सीटों पर प्रभारियों की घोषणा की है, जिनमें 10 मुस्लिम उम्मीदवार शामिल हैं। यह कदम अल्पसंख्यक वोटों को साधने की उनकी कोशिश को दर्शाता है। जानकारों का मानना है कि चंद्रशेखर की यह रणनीति सामाजिक समीकरणों को बदल सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां दलित और मुस्लिम वोटों का गठजोड़ निर्णायक साबित हो सकता है।

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