"क्या महिलाएं घर में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं?" सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, 38 साल बाद मिला न्याय!
सुप्रीम कोर्ट ने जेंडर भेदभाव के 38 साल पुराने मामले में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने हरियाणा की सुमित्रा को नौकरी ना देने पर 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) को लेकर एक सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) को आदेश दिया है कि वह हरियाणा की एक महिला को 12 लाख रुपये का मुआवजा दे। कंपनी ने 38 साल पहले इस महिला को सिर्फ इसलिए नौकरी देने से मना कर दिया था क्योंकि वह एक महिला थी। अदालत ने इसे 'नारीत्व का सीधा अपमान' करार दिया है।
क्या है 38 साल पुराना यह पूरा मामला?
यह कानूनी लड़ाई साल 1988 से शुरू हुई थी। हरियाणा के गुढ़ा गांव की रहने वाली सुमित्रा ने IOC के LPG बॉटलिंग प्लांट में खलासी, चपरासी या रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए आवेदन किया था। उस दौरान डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली समिति ने 49 लोगों की सूची की सिफारिश की थी, जिसमें सुमित्रा का नाम भी शामिल था।
जब नियुक्ति का समय आया, तो अन्य सभी उम्मीदवारों को अपॉइंटमेंट लेटर दे दिए गए, लेकिन सुमित्रा को यह कहकर नौकरी देने से इनकार कर दिया गया कि वह एक महिला हैं और यह काम उनके लिए उपयुक्त नहीं है।