आजादी के अनसुने वीर: 79वें स्वतंत्रता दिवस पर उन नायकों को सलाम

79वें स्वतंत्रता दिवस पर, हम मातंगिनी हाजरा, कानक्लता बरुआ, उधम सिंह जैसे 10 गुमनाम नायकों की कहानियों को याद करते हैं, जिनके बलिदान ने भारत को आजादी दी। उनकी प्रेरणा से आइए, एकता और प्रगति का नया भारत बनाएँ।

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August 14, 2025 • 7:45 PM  45
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आजादी के अनसुने वीर: 79वें स्वतंत्रता दिवस पर उन नायकों को सलाम
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आजादी के अनसुने वीर: 79वें स्वतंत्रता दिवस पर उन नायकों को सलाम

15 अगस्त 2025 को, जब भारत अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा, तिरंगा पूरे देश में गर्व के साथ लहराएगा। लाल किले की प्राचीर से जन-गण-मन की धुन हवा में गूंजेगी, और हर भारतीय का दिल देशभक्ति से भर उठेगा। लेकिन यह आजादी मुफ्त में नहीं मिली। यह अनगिनत आंसुओं, बलिदानों और उन अनसुनी कहानियों की देन है, जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई हैं। इस स्वतंत्रता दिवस पर, आइए उन 10 गुमनाम नायकों की कहानियों को फिर से जीवंत करें, जिन्होंने अपने खून और सपनों से भारत को आजादी का सूरज दिया। ये कहानियाँ न केवल हमारे दिलों को छूएँगी, बल्कि हमें यह भी याद दिलाएँगी कि आजादी एक अनमोल उपहार है, जिसे सहेजने की जिम्मेदारी हमारी है।

मातंगिनी हाजरा: तिरंगे की आखिरी साँस “वंदे मातरम्” की गूंज में अमर बलिदान

1942 की एक उमस भरी सुबह, बंगाल के तमलुक गाँव में 72 साल की मातंगिनी हाजरा सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों के साथ सड़कों पर थीं। उनके झुर्रियों भरे हाथों में तिरंगा लहरा रहा था, और होंठों पर वंदे मातरम् का गीत गूंज रहा था। ब्रिटिश पुलिस की लाठियाँ बरसीं, फिर गोलियाँ चलीं। पहली गोली उनके बाएँ हाथ को भेद गई। मातंगिनी ने तिरंगा दाएँ हाथ में थाम लिया। दूसरी गोली ने उनके दाएँ हाथ को छलनी कर दिया, लेकिन उन्होंने झंडा अपनी छाती से लगा लिया। तीसरी गोली उनके सीने को भेद गई, पर मातंगिनी, जिन्हें लोग “गांधी बुढ़ी” कहते थे, वंदे मातरम् गाती रहीं। जब उनकी साँसें थमीं, तब भी तिरंगा जमीन को नहीं छू सका। उम्र और कमजोरी देशप्रेम के सामने बौनी पड़ जाती है। मातंगिनी की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा साहस दिल से निकलता है, शरीर की सीमाओं से नहीं।

कानक्लता बरुआ: 17 साल की क्रांति की लौ असम की नन्हीं शेरनी

1942 में असम के गोहपुर की सँकरी गलियों में 17 साल की कानक्लता बरुआ ने अपने साथियों से कहा, “आज हम पुलिस थाने पर तिरंगा फहराएँगे।” उनके चेहरे पर न डर था, न हिचक। जुलूस जैसे ही थाने के पास पहुँचा, ब्रिटिश पुलिस ने गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं। कानक्लता ने तिरंगे को सीने से लगाया और आगे बढ़ती रहीं। एक गोली उनके कंधे को चीर गई, दूसरी उनके सीने में। लेकिन तिरंगा उनके हाथों से नहीं छूटा। उनके गिरते ही साथी गोलोक चंद्र बरुआ ने झंडा थामा और उसे थाने पर फहराया। कानक्लता की शहादत ने असम में क्रांति की ऐसी लौ जलाई, जो आज भी जलती है।
उम्र छोटी हो या बड़ी, देशप्रेम की कोई सीमा नहीं होती। कानक्लता की कहानी हमें बताती है कि साहस और संकल्प की कोई उम्र नहीं होती।

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