साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट शर्त रखी है कि आरोपी को हर सुनवाई पर अदालत में अनिवार्य रूप से पेश होना होगा।
बचाव पक्ष की दलील: “ड्राइविंग साबित नहीं कर पाई पुलिस”
आरोपी की ओर से वकील अंशुमान सक्सेना ने कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि:
- पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि हादसे के समय कार दिनेश रणवा ही चला रहा था
- कोई शिनाख्त परेड (TIP) नहीं करवाई गई
- न ही कोई ठोस सीसीटीवी फुटेज कोर्ट में पेश किया गया
उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह 18 जनवरी से जेल में बंद है। चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, लेकिन ट्रायल लंबा चलने की संभावना है, इसलिए जमानत दी जानी चाहिए।
सरकारी पक्ष का विरोध
सरकारी वकील ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट में कहा:
- हादसे के समय कार आरोपी के कब्जे में थी
- वाहन तेज रफ्तार में चलाया जा रहा था
- हादसे के बाद आरोपी करीब 10 दिनों तक फरार रहा
- घटनास्थल से पकड़े गए सह-आरोपियों ने सीधे तौर पर उसका नाम लिया है
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए जमानत मंजूर कर ली।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 9 जनवरी की देर रात का है। जयपुर के सांगानेर इलाके में खरबास चौराहे के पास तेज रफ्तार ऑडी कार ने कहर मचा दिया।
घटना का क्रम बेहद भयावह था:
- कार पहले चौराहे पर डिवाइडर से टकराई
- इसके बाद करीब 200 मीटर तक बेकाबू दौड़ती रही
- सर्विस लेन में लगे ठेलों और स्टॉल्स को रौंद दिया
- कुल 15 लोग इसकी चपेट में आ गए
एक की मौत, 14 घायल
इस दर्दनाक हादसे में भीलवाड़ा निवासी रमेश, जो सड़क किनारे ढाबे पर काम करता था, उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
इसके अलावा 14 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनमें कई की हालत नाजुक बताई गई थी।
लंबा चल सकता है मुकदमा
चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, लेकिन इस तरह के मामलों में गवाह, तकनीकी सबूत और सुनवाई की प्रक्रिया लंबी चलती है। इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी को सशर्त जमानत देने का फैसला लिया।
केस बना था बड़ा मुद्दा
यह मामला उस समय काफी चर्चा में रहा था, क्योंकि:
- हादसा भीड़भाड़ वाले इलाके में हुआ
- पीड़ित आम मजदूर और राहगीर थे
- तेज रफ्तार और लापरवाही ने कई जिंदगियां प्रभावित कर दीं
आगे क्या?
अब आरोपी को हर सुनवाई में कोर्ट में पेश होना होगा। यदि वह शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत रद्द भी की जा सकती है।
निष्कर्ष:
जयपुर का यह मामला कानून, सबूत और न्याय प्रक्रिया के बीच संतुलन को दिखाता है। जहां एक ओर गंभीर आरोप हैं, वहीं दूसरी ओर कोर्ट ने सबूतों की स्थिति को देखते हुए आरोपी को राहत दी है—लेकिन सख्त शर्तों के साथ।