जोधपुर में ब्राह्मण समाज के उत्पीड़न से परेशान तीन लोगों ने मांगी इच्छा मृत्यु, हाईकोर्ट में याचिका दायर.
जोधपुर के इस मामले ने सामाजिक रूढ़ियों और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। क्या परंपराएं व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हावी हो सकती हैं? क्या सामाजिक पंचायतों को इस तरह के दंड देने का अधिकार है? इन सवालों का जवाब राजस्थान उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई में मिल सकता है। तब तक, यह खबर सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।
जोधपुर, राजस्थान में पालीवाल ब्राह्मण समाज के तीन व्यक्तियों—लोलावास के राजाराम, काकेलाव के दलाराम और खींवसर के जेठाराम—ने सामाजिक बहिष्कार और उत्पीड़न से तंग आकर जिला कलेक्टर अग्रवाल के सामने इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई है। इन तीनों ने पालीवाल ब्राह्मण समाज के भीतर ही विवाह किया था, लेकिन समाज के पंचों ने उनके इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया। पंचों ने न केवल उन पर भारी जुर्माना लगाया, बल्कि उन्हें समाज से बाहर भी कर दिया। इस अन्याय के खिलाफ तीनों ने लूणी और डांगियावास पुलिस थानों में मुकदमे दर्ज कराए हैं और राजस्थान उच्च न्यायालय में रिट याचिका भी दायर की है।
पृष्ठभूमि और उत्पीड़न का कारण:
पालीवाल ब्राह्मण समाज, जो अपनी परंपराओं और सामाजिक नियमों के लिए जाना जाता है, में विवाह संबंधी कड़े नियम हैं। राजाराम, दलाराम और जेठाराम ने समाज के भीतर ही विवाह किया था, लेकिन पंचों ने इसे नियमों का उल्लंघन मानते हुए उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की। आरोप है कि पंचों ने इन तीनों पर सामाजिक दबाव बनाया, जुर्माना लगाया और अंततः उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया। इस उत्पीड़न ने तीनों को मानसिक और सामाजिक रूप से इस कदर तोड़ दिया कि उन्होंने इच्छा मृत्यु की मांग उठाई।