वो मंदिर जहां 'साहूकार' बनकर गजानन खुद देते थे भक्तों को उधार, कहानी सुनकर उड़ जाएंगे होश!

झीलों की नगरी उदयपुर में स्थित बोहरा गणेश मंदिर अपने चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि एक समय में यहां भगवान गणेश साहूकार की तरह अपने भक्तों को उधार पैसा देते थे। जानिए इस अनूठे मंदिर का इतिहास और परंपराएं।

yashaswani
yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026Sub Editor
September 14, 2026 • 12:01 PM  59
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राजस्थान
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वो मंदिर जहां 'साहूकार' बनकर गजानन खुद देते थे भक्तों को उधार, कहानी सुनकर उड़ जाएंगे होश!
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14 Sep 2026
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वो मंदिर जहां 'साहूकार' बनकर गजानन खुद देते थे भक्तों को उधार, कहानी सुनकर उड़ जाएंगे होश!

राजस्थान का मेवाड़ अंचल न सिर्फ अपने शौर्य बल्कि आस्था और चमत्कारों की अनगिनत कहानियों के लिए भी जाना जाता है। झीलों की नगरी उदयपुर में एक ऐसा ही अद्भुत और चमत्कारी मंदिर स्थित है, जो देश के बाकी गणेश मंदिरों से बिल्कुल अलग है। हम बात कर रहे हैं शहर के प्रसिद्ध 'बोहरा गणेश मंदिर' की। यहां विराजमान विघ्नहर्ता न सिर्फ भक्तों के कष्ट हरते हैं, बल्कि एक समय में वे साहूकार बनकर लोगों की आर्थिक मदद भी किया करते थे।

क्यों पड़ा 'बोहरा गणेश' नाम?

मेवाड़ में प्राचीन काल में जो लोग ब्याज पर पैसा उधार देने का व्यवसाय करते थे, उन्हें 'बोहरा' कहा जाता था। मंदिर के पुजारी लोकेश जोशी बताते हैं कि पुराने समय में जब भी किसी गरीब या जरूरतमंद को शादी-ब्याह, व्यापार या किसी अन्य काम के लिए पैसों की किल्लत होती थी, तो वह भगवान गणेश की शरण में आता था। बप्पा साहूकार (बोहरा) की तरह अपने भक्तों के सुख-दुख में काम आते थे, इसलिए उनका नाम 'बोहरा गणेश' पड़ गया।

पर्ची पर लिखकर मांगते थे धन, एक लालच ने बंद की प्रथा

मंदिर के जानकारों के अनुसार, पैसों की जरूरत होने पर भक्त अपनी मांग एक कागज की पर्ची पर लिखकर गजानन के चरणों में छोड़ जाते थे। चमत्कारिक रूप से उनकी आर्थिक जरूरत पूरी हो जाती थी। काम पूरा होने के बाद भक्त पूरी ईमानदारी से वह कर्ज मंदिर में लौटा जाते थे। यह प्रथा भगवान और भक्त के बीच अटूट विश्वास का प्रतीक थी। हालांकि, किवदंतियों के अनुसार एक बार किसी व्यक्ति ने पैसे वापस नहीं लौटाए, जिसके बाद यह चमत्कारिक लेन-देन हमेशा के लिए बंद हो गया।

देश का दुर्लभ मंदिर, जहां खड़ी मुद्रा में हैं गजानन

आमतौर पर देशभर के मंदिरों में भगवान गणेश की बैठी हुई या लेटी हुई (आराम की मुद्रा) प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं। लेकिन बोहरा गणेश मंदिर में बप्पा खड़े हुए हैं। शास्त्रों के जानकारों के मुताबिक, गणेश जी की खड़ी प्रतिमा को बेहद ऊर्जावान, सक्रिय और तुरंत फलदायी माना जाता है। यही वजह है कि यहां मांगी गई मन्नतें जल्द पूरी होती हैं।

दाल-बाटी-चूरमे का लगता है विशेष भोग

इस मंदिर की परंपराओं में मेवाड़ी संस्कृति की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है। वैसे तो गजानन को रोज मोदक और लड्डू का भोग लगता है, लेकिन जब किसी भक्त की कोई बड़ी मन्नत पूरी होती है, तो वह भगवान को राजस्थान के प्रसिद्ध 'दाल-बाटी-चूरमा' का विशेष भोग लगाता है।

शुभ कार्यों का पहला न्योता बप्पा के नाम

उदयपुर और इसके आसपास के इलाकों में बोहरा गणेश जी को घर के बुजुर्ग के समान दर्जा प्राप्त है। आज भी घरों में शादी, गृह प्रवेश, नई गाड़ी खरीदना या नया व्यापार शुरू करना हो, तो सबसे पहला निमंत्रण पत्र (कार्ड) बप्पा के दरबार में ही चढ़ाया जाता है। लोगों का अटूट विश्वास है कि उन्हें पहला न्योता देने से हर काम बिना किसी विघ्न के संपन्न होता है।

बुधवार और गणेश चतुर्थी पर उमड़ता है आस्था का सैलाब

वैसे तो यहां रोजाना श्रद्धालुओं की कतारें लगती हैं, लेकिन बुधवार के दिन सुबह की मंगला आरती से ही भक्तों का भारी हुजूम उमड़ पड़ता है। गणेश महोत्सव और गणेश चतुर्थी के दौरान मंदिर की छटा देखते ही बनती है। इस दौरान भगवान का विशेष पंचामृत स्नान, मनमोहक श्रृंगार, महायज्ञ और छप्पन भोग का आयोजन किया जाता है, जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु बप्पा के दर्शन कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद लेते हैं।

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yashaswani Verified Public Figure • 17 Aug, 2026Sub Editor

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