“रेगिस्तान की रहस्यमयी बेरियां: पश्चिमी राजस्थान रामसर का मीठा चमत्कार”

रामसर, राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट बसा एक गांव है, जो 100 से अधिक बेरियों (पारंपरिक कुओं) के लिए प्रसिद्ध है। ये बेरियां, जो मीठा पानी देती हैं, कभी 30-40 गांवों की प्यास बुझाती थीं, जबकि आसपास का पानी खारा है। स्थानीय लोग इसे दैवीय चमत्कार मानते हैं। बुजुर्गों की कहानियां बताती हैं कि ये बेरियां पीढ़ियों से जीवन रेखा रही हैं, लेकिन आधुनिकता और उपेक्षा के कारण कई बेरियां सूख चुकी हैं या खारा पानी देने लगी हैं। पंचायत ने कुछ का पुनर्निर्माण करवाया, फिर भी ये विलुप्ति के कगार पर हैं। आज भी ग्रामीण महिलाएं इनसे पानी लेती हैं, जो राजस्थान के जल संकट में इनके महत्व को दर्शाता है। यह कहानी प्रकृति के चमत्कार और इसके संरक्षण की आवश्यकता को उजागर करती है।

Ashok Shera
Ashok Shera Official | Verified Expert • 11 Jun, 2026 Editor
May 29, 2025 • 4:16 PM  143
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29 May 2025
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“रेगिस्तान की रहस्यमयी बेरियां:  पश्चिमी राजस्थान रामसर का मीठा चमत्कार”

राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान में, जहां थार की तपती रेत और सूरज की चिलचिलाती गर्मी हर कदम पर जीवन को चुनौती देती है, वहां भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट बसा है रामसर गांव। यह गांव केवल एक बस्ती नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक चमत्कार का गवाह है—100 से अधिक बेरियां (पारंपरिक कुएं), जिनका मीठा पानी न केवल रामसर, बल्कि आसपास के 30 से 40 गांवों की प्यास बुझाने का स्रोत रहा है। जहां रेगिस्तान में पानी की एक बूंद भी स्वप्न सा प्रतीत होता है, वहां इन बेरियों का मीठा पानी किसी दैवीय वरदान से कम नहीं। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध और समय के थपेड़ों ने इन बेरियों को विलुप्ति के कगार पर ला खड़ा किया है। यह कहानी रामसर की उन बेरियों की है, जो राजस्थान के जल संकट के बीच एक उम्मीद की किरण हैं, और जिनके संरक्षण की जरूरत आज पहले से कहीं ज्यादा है।

रामसर की बेरियों का इतिहास और महत्व

रामसर की बेरियां कोई साधारण कुएं नहीं हैं। ये छोटे-छोटे गोलाकार गड्ढे हैं, जिन्हें रेगिस्तान की रेत में खोदा गया है, और आश्चर्यजनक रूप से इनमें मीठा पानी भरा रहता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, ये बेरियां कई पीढ़ियों से इस क्षेत्र की जीवन रेखा रही हैं। एक समय था जब आसपास के सैकड़ों गांवों की महिलाएं सुबह-शाम इन बेरियों पर इकट्ठा होती थीं। वे अपने सिर पर मटके और घड़े संभाले, मीलों पैदल चलकर यहां पानी भरने आती थीं। जहां रेगिस्तान की धरती खारा और बेकार पानी देती थी, वहीं रामसर की इन बेरियों से निकलने वाला पानी शुद्ध और मीठा था। यह एक ऐसा रहस्य है जो आज भी वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है।

एक बुजुर्ग, जिनका नाम गोपाल सिंह है, ने अपनी आंखों में चमक लिए बताया, “मैंने बचपन से इन बेरियों से पानी पिया है। मेरे दादा-परदादा भी यही करते थे। यह पानी केवल प्यास नहीं बुझाता, यह हमारी संस्कृति और जीवन का हिस्सा है।” गोपाल सिंह ने यह भी बताया कि एक समय था जब इन बेरियों से निकलने वाला पानी पूरे क्षेत्र के लिए पर्याप्त था। लेकिन अब कई बेरियां सूख चुकी हैं, और कुछ का पानी खारा हो गया है।

Ashok Shera Official | Verified Expert • 11 Jun, 2026 Editor

"द खटक" एडिटर-इन-चीफ

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